Thursday, 6 September 2012

चुम्बक की प्रयोग विधियाँ

भिन्न-भिन्न चिकित्सकों ने अपने-अपने प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर विविध पद्धतियाँ विकसित की हैं। प्रत्येक पद्धति से रोग निवारण में सफलता प्राप्त हुई है। अब तक के प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि चुम्बकों का उपयोग किसी भी तरह से किया जाए, उसका असर तो पूरे शरीर पर होता है, साथ ही इस चिकित्सा का कोई दुष्परिणाम नहीं होता। चुम्बक प्रयोग विधि के दो मुख्य प्रकार हैं- 1. किसी भी एक अर्थात्‌ उत्तर या दक्षिण ध्रुव का उपयोग अथवा 2. दोनों ध्रुवों के एक साथ उपयोग, अर्थात्‌ सार्वदैहिक प्रयोग।

सार्वदैहिक चिकित्सा में दोनों ध्रुवों के सिद्धांतानुसार चुम्बक लगाने के पाँच तरीके हैं-

इन दोनों विधियों के विषय में अधिक विचार करने से पहले प्रत्येक ध्रुव के गुणधर्मों को जान लेना आवश्यक है।

दक्षिणी ध्रुव के गुण-धर्

1. दक्षिणी ध्रुव में अवरोधक एवं वेग को मंद करने वाली शक्ति निहित है।

2. यह ठंडक और शांति प्रदान करता है।

3. यदि इस ध्रुव को कुछ देर तक सादे पानी में रखा जाए तो पानी की क्षारीयता बढ़ती है, अर्थात्‌ दक्षिणी ध्रुव अम्लता कम करता है।

4. इसमें संकोचन करने का गुण है।

5. यह सूक्ष्म केशवाहिनियों में रक्त परिभ्रमण की गति को मंद करता है।

6. यह संक्रमण को नियंत्रित और सूजन को कम करता है।

7. यह फोड़े-गाँठ आदि के विकास को रोकता है और उसे नियंत्रित करता है।

8. दक्षिणी ध्रुव के चुम्बकीय क्षेत्र में रखे हुए फल, साग-भाजी, दूध आदि लंबे समय तक ताजा रहते हैं।

संक्रमण और सूजन में दक्षिणी ध्रुव उपयोगी सिद्ध होता है। चर्मरोग, संधि स्थलों के रोग, सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा फैलते हुए सक्रमण, गाँठों, मानसिक अशांति, मूर्च्छा, आँखों की खामियाँ, आँखों के रोग, ज्ञानतंतु के दर्द, अनिद्रा आदि में दक्षिणी ध्रुव लाभप्रद है।

उत्तरी ध्रुव के गुणधर्

उत्तरी ध्रुव में दक्षिणी ध्रुव की अपेक्षा विपरीत गुण होते हैं।

1. वह गर्मी और शक्ति प्रदान करता है तथा शरीर की क्रियाओं को उत्तेजित करता है।

2. इस ध्रुव को थोड़ी देर पानी में रखने के बाद यदि पीएच डिटेक्टर के द्वारा पानी का परीक्षण किया जाए तो वह अम्लीय मालूम पड़ता है। इस प्रकार यह क्षारीयता (प्रति अम्लता) कम करता है।

3. यह क्षेत्र बढ़ाता है।

4. यह सूक्ष्म केशवाहिनियों के रक्त परिभ्रमण में वेग लाता है।

5. यह संक्रमण को बढ़ाता है, क्योंकि जीवाणुओं को भी वह शक्ति और गर्मी देता है। यह सूजन बढ़ाता है।

6. सामान्य और कैंसर की गाँठ के कोषों को भी यह उत्तेजित करता है। अतः गाँठ बढ़ती है अथवा पककर फूट जाती है।

7. उत्तरी ध्रुव के चुम्बकीय क्षेत्र में रखे हुए फल जल्दी से पकते हैं। साग-भाजी थोड़े समय में सड़ने लगती है और दूध खट्टा होने लगता है।

उत्तरी ध्रुव में उत्तेजना, शक्ति और गर्मी देने वाले गुण-धर्म होने से वह पक्षाघात, अंत्रवृद्धि- हर्निया, त्वचा के सफेद दाग, एलोपेसिआ (सिर के केशरहित चकत्ते), स्नायविक कमजोरी, सामान्य और बीमारी के बाद की कमजोरी, मूर्च्छा रोग इत्यादि में उपयोगी सिद्ध होता है।

चुम्बक चिकित्सा के लाभ

यह हर आयु के नर-नारियों के लिए गुणकारी है। चुम्बकों के माध्यम से इलाज इतना सीधा-सादा है कि यह किसी भी समय, किसी भी स्थान पर और शरीर के किसी भी अंग पर आजमाया जा सकता है। पुरुष हो या स्त्री, जवान हो या बूढ़ा, सभी इससे लाभान्वित हो सकते हैं।

चुम्बकत्व से रक्तसंचार सुधरता है 

कुछ समय तक चुम्बक लगातार शरीर के संपर्क में रहे तो शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है, उसकी सारी क्रियाएँ सुधर जाती हैं और रक्तसंचार बढ़ जाता है। इस कारण सारे शरीर को शक्ति मिलती है, रोग दूर होने में सहायता मिलती है, थकावट और दुर्बलता दूर होती
है, जिससे रोगी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करता है और शरीर के प्रत्येक अंग की पीड़ा और सूजन भी दूर हो जाती है।

कुछ मामलों में लाभ बड़ी तेजी से 

यह पद्धति इतनी शक्तिशाली है और इसका प्रभाव इतनी तेजी से पड़ता है कि कई बार एक ही बार चुम्बक लगाना रोग को सदा के लिए समाप्त करने के लिए काफी होता है। कई मामलों में दूसरी बार चुम्बक लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। जैसे कि दाँत की पीड़ा और मोच आदि में।

पहले से तैयारी जरूरी नहीं 

एक ही चुम्बक का अनेक व्यक्ति उपयोग कर सकते हैं। उन्हें साफ करने, धोने या जंतुरहित बनाने की आवश्यकता नहीं होती। यद्यपि त्वचा के संक्रामक रोग की चिकित्सा में जिस चुम्बक का उपयोग हुआ हो, उसकी सफाई करनी पड़ती है। यदि महीन कपड़े के आवरण का उपयोग किया हो तो चुम्बक की सफाई का कोई प्रश्न ही नहीं रहता, केवल कपड़े को साफ करना पर्याप्त होता है।

इसकी लत नहीं पड़ती 

चुम्बक के उपचार की आदत नहीं पड़ती और उसका उपयोग अचानक बंद कर दिया जाए तो भी कोई मुश्किल खड़ी नहीं होती।

चुम्बक शरीर से पीड़ा को खींच लेता है 

प्रत्येक रोग में कोई न कोई पीड़ा अवश्य होती है। पीड़ा चाहे किसी कारण से हो, चुम्बक में उसे घटाने, बल्कि समाप्त तक करने का गुण है। उसकी सहायता से शरीर की सारी क्रियाएं सामान्य हो जाती हैं। इसी कारण सभी रोगों पर चुम्बकों का प्रभाव पड़ता है, पीड़ा दूर हो जाती है और शरीर की क्रियाओं के विकार ठीक हो जाते हैं।

यौवन को बनाए रखने का साधन 

चुम्बकों का उपयोग करने वाले को चुम्बक ताजगी, शक्ति और यौवन प्रदान करते हैं। ये शरीर में होने वाले वृद्धावस्था के परिवर्तनों की गति को मंद करते हैं। कुछ उदाहरणों में तो इस चिकित्सा से सफेद बाल काले होते देखे गए हैं।

आत्म-सम्मोहन चिकित्सा

आत्मसम्मोहन व आत्मचिंतन की मदद से आपके शरीर तथा दिमाग दोनों सही परिणाम देने लगेंगे। हालाँकि निगेटिव विचार तनावपूर्ण परिस्थितियों की देन होते हैं, लेकिन आप अपने अंदर संतुलन पैदा कर आत्म सुझावों द्वारा उनका सामना कर सकते हैं। इसके लिए कुछ लोग मंत्रों को मन ही मन पढ़ते या फिर बोलकर उच्चारण भी करते हैं, ताकि मन को शांति एवं नई दिशा व सजगता मिल सके। मंत्रों के शब्द मन के अंदर एक जबर्दस्त पवित्र छाप छोड़ते हैं। ये शब्द दिलो-दिमाग पर गूँजते हैं, जिससे पूरा शरीर प्रभावित होता है। 

अब जब संतुलन ही अहम चीज है, तो यहाँ हम कुछ ऐसी बातों का जिक्र करने जा रहे हैं, जिन पर अमल कर शुरू से ही आप अपने शरीर को संतुलित और स्वस्थ बना सकते हैं। आयुर्वेद ने इस संबंध में एक प्रणाली का उल्लेख किया हुआ है, जिसे हम सेल्फ रेफरल कहते हैं। सेल्फरेफरल का मतलब है- अपने अंदर झाँकना या आत्मनिरीक्षण करना और फिर आत्मचिंतन करना। 

  बिस्तर पर जाने से पहले या फिर तनाव की स्थिति में संगीत सुनने से मन आत्मचिंतन की प्रेरणा पाता है और प्रतिदिन आत्म-सम्मोहन के सफल अभ्यास से नकारात्मक भावनाएँ दूर होती हैं और शरीर व मन स्वस्थ हो जाता है।      
जब आपको सुख का अनुभव हो, तो समझिए कि आप आत्मचिंतन कर रहे हैं और जब डर, चिंता, नाराजगी- जैसे भाव आने लगें, तो समझिए कि आप आत्मचिंतन से बाहर आ गए हैं और आप वस्तु चिंतन कर रहे हैं, क्योंकि इन भावनाओं की उत्पत्ति का कारण ही वस्तु- चिंतन है। और वस्तु चिंतन कुंठा एवं मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण होता है। इससे न सिर्फ सफलता की राह में रुकावट आती है, बल्कि आपके शरीर को कहीं न कहीं नुकसान भी पहुँचता है। 

मनुष्य लगभग 10 हजार तरह की गंधों को पहचान सकता है और गंध संबंधी कोशिकाएँ नाक के अंदर मौजूद झिल्ली पर होती हैं। यही कोशिकाएँ गंध संबंधी खबर सीधे मस्तिष्क के अंदर स्थित हाइपोथैलमस के पास भेजती है। हाइपोथैलमस मस्तिष्क का एक बहुत छोटा-सा भाग है, मगर वह शरीर की दर्जनों प्रक्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता है। 

जैसे- शरीर का तापमान, प्यास, खून में शर्करा का स्तर, विकास, नींद, जागना, भावनाएँ और पाचन। इस तरह गंध की कोई खबर सबसे पहले हाइपोथैलमस को प्रभावित कर, उसकी कार्य विधियों को सही रखती है। 

ऐसे में खास-खास किस्म की गंधों के जरिए तीनों दोषों (वात, कफ, पित्त) को भी संतुलित किया जा सकता है। जैसी तुलसी, संतरा-मौसंबी और लौंग की गंध वात को प्रभावित करती है, वैसे ही चंदन, गुलाब, पुदीना और दालचीनी की मीठी-ठंडी खुशबू से पित्त संतुलित रहता है। और लौंग, काली मिर्च, मिंट आदि की गंध कफ को संतुलित करती है। अन्य जरूरतों के लिए भी कई गंधों के मिश्रण तैयार किए जा सकते हैं। 

एक तरह से देखा जाए, तो आपका शरीर हमेशा उस वातावरण को ग्रहण करता रहता है, जिसमें आप रहते हैं और यह कार्य आपकी इंद्रियाँ करती हैं। लिहाजा, शारीरिक संतुलन के लिए शरीर का मन से संतुलन बनाए रखना भी जरूरी होता है। इसके लिए आत्म-सम्मोहन विधि सबसे ज्यादा उपयोगी साबित होती है। 



इसके अनुसार आत्म-सम्मोहन के दौरान ओंकार संगीतमय ध्वनि से आपके शरीर और दिमाग का संतुलन तो ठीक होता ही है, इर्द-गिर्द का वातावरण भी संतुलित होता है। इसमें कोई शक नहीं कि ध्वनि का मन और शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

बिस्तर पर जाने से पहले या फिर तनाव की स्थिति में संगीत सुनने से मन आत्मचिंतन की प्रेरणा पाता है और प्रतिदिन आत्म-सम्मोहन के सफल अभ्यास से नकारात्मक भावनाएँ दूर होती हैं और शरीर व मन स्वस्थ हो जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि अनुभवी व जानकार सम्मोहन चिकित्सक से 7 से 10 दिन तक लगातार सम्मोहन की विधि सीखी जाए। जो लोग एक या दो दिन में सिखाने का दावा करते हैं वे केवल इस विधि का आपको प्रारंभिक ज्ञान दे सकते हैं, इसके वास्तविक लाभ का अनुभव नहीं करा सकते।

स्वरोदय विज्ञान का आधार

स्वर चिकित्सा का इतिहास पुराना है। स्वर को जानने का तरीका भी बेहद सरल है। सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।

इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।

सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ 

(1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।

(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।

(3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

स्वरोदय विज्ञान का आधार

स्वर चिकित्सा का इतिहास पुराना है। स्वर को जानने का तरीका भी बेहद सरल है। सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।

इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वरोदय विज्ञान का आधार हैं।

सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।

स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ 

(1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है।

(2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा।

(3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

स्वरोदय विज्ञान क्या है?

आईने में क्या कभी आपने अपनी नाक को ध्यान से देखा है? अगर हाँ, तो बताइए हमारे जीवन में नाक की क्या उपयोगिता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के बाद ही आगे पढ़ें। यदि आपका उत्तर भी यही है कि नाक हमारी प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय है, इसके द्वारा हम गंध की पहचान एवं आवश्यक प्राणवायु ग्रहण करते हैं, तो आज तक आप भी एक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक विज्ञान से अनभिज्ञ हैं।

इसके विपरीत यदि आपके उत्तर में स्वर-विज्ञान या स्वरोदय विज्ञान का भी उल्लेख है, तो निश्चित ही आप भाग्यवान हैं एवं ईश्वर के कृपापात्र हैं, क्योंकि स्वर विज्ञान को जानने वाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर निकल जाता है।

स्वर विज्ञान एक बहुत ही आसान विद्या है। इस विद्या को प्रसिद्ध स्वर साधक योगीराज यशपालजी ने 'विज्ञान' कहकर सुशोभित किया है। इनके अनुसार स्वरोदय, नाक के छिद्र से ग्रहण किया जाने वाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है।

स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में ला सकता है।

स्वरोदय अपने आप में पूर्ण विज्ञान है। इसके ज्ञान मात्र से ही व्यक्ति अनेक लाभों से लाभान्वित होने लगता है। इसका लाभ प्राप्त करने के लिए आपको कोई कठिन गणित, साधना, यंत्र-जाप, उपवास या कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होती है। आपको केवल श्वास की गति एवं दिशा की स्थिति ज्ञात करने का अभ्यास मात्र करना है।

यह विद्या इतनी सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।

आयुर्वेद हमेशा आगे रहेगा


भारत में आयुर्वेद की प्राचीन यशस्वी परंपरा रही हैं। भारत की कई बड़ी कंपनियाँ इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहीं हैं। इस श्रृंखला में वैद्यनाथ और डाबर दो प्रमुख नाम हैं। धन्वंतरि जयंती पर आयुर्वेद की महत्ता प्रतिपादित करते हुए प्रस्तुत है इन कंपनियों की जानकारी देती यह विशेष रिपोर्ट: 

वैद्यनाथ आयुर्वेद देशी दवा की वह कंपनी है जो अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई की अग्नि से तपते हुए निकली है। उस लड़ाई में वैद्यनाथ ने 'अंग्रेजी दवाई भारत छोड़ो' की आहुति दी थी। वैद्यनाथ आयुर्वेद के अध्यक्ष व प्रबंधन विशेषज्ञ अजय शर्मा कहते हैं, 'हमारी वह लड़ाई अभी तक जारी है। यही वजह है कि आज अगर आयुर्वेद की कोई कंपनी इस पद्धति का पर्याय बनी हुई है तो वह वैद्यनाथ है।' 

1942 में भारत छो़ड़ो आंदोलन के समय वैद्यनाथ ने एक नारा दिया था - 'देश की मिट्टी, देश की हवा, देश का पानी, देश की दवा।' अंग्रेजी हुकूमत व दवा के खिलाफ जो लड़ाई तब शुरू हुई वह अभी खत्म नहीं हुई है। अंततः दुनिया मानेगी कि आयुर्वेद ही मानव का कल्याण करने में सक्षम है। 

वैद्यनाथ आज भी सिद्धांतों पर अटल है। हमने कभी अपनी दवा को ब्रांड नहीं बनाया। कई पड़ाव आए लेकिन वैद्यनाथ आयुर्वेद की मूल विशेषता में कोई घालमेल नहीं होने दिया गया।' वैद्यनाथ अभी पूरी दुनिया में फैला है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका में इस कंपनी के 33 डीलर हैं। वहाँ डलास में वैद्यनाथ का मुख्यालय है। 

यह कंपनी यूरोपीय देश इटली, जर्मनी व बेल्जियम आदि में भी निर्यात कर रही है। लंदन से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर लौटे अपने पिता रामावतार शर्मा से जब उनके बेटे अजय शर्मा ने कमान संभाली तो इसके प्रचार-प्रसार को पंख लग गए। वे कहते हैं- 'इस कंपनी के च्यवनप्राश, दशमूलारिष्ट, महानारायण तेल, चंद्र प्रभावटी, महायोगराज गूगल आदि दवाओं की एक खास विश्वसनीयता है। वैद्यनाथ की खास दवाएँ, कासामृत, बीटा एक्स, कब्जहर तो लोगों की जुबान पर है।' 

वर्ष 1918 मे स्थापित यह कंपनी अभी 700 आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्माता बन गई है। इसके पास अत्याधुनिक फैक्टरियाँ हैं और वहाँ पूरी तरह वैज्ञानिक पद्धतियों से काम होता है। दवा की गुणवत्ता ही इस कंपनी की पहचान है। कंपनी के पास भारत सरकार द्वारा स्वीकृत शोध केंद्र है जहाँ योग्य वैज्ञानिकों की टीम है। आयुर्वेद में वैद्यनाथ की विश्वसनीयता का यह पैमाना है कि यहाँ से आयुर्वेद पर छपने वाली पुस्तक आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल की जाती हैं। 

आयुर्वेद

इसके 'आयुर्वेदिक सार संग्रह' में आयुर्वेदिक उत्पादों की सारी विधियाँ संकलित हैं। यह भारत सरकार द्वारा स्वीकृत फर्माकोपिया (दवा फॉरमुलेशन का संकलन) का हिस्सा है। पूरे देश में वैद्यनाथ आयुर्वेद के कॉलेज, अस्पताल व डिस्पेंसरियाँ हैं। अजय शर्मा कहते हैं- 'वैद्यनाथ की पुर्णाहुति तब होगी जब आम लोगों की अंग्रेजी दवाओं पर निर्भरता से मुक्ति मिल जाएगी। भारतीय चिकित्साशास्त्र की यह पद्धति सभी स्वास्थ्य चुनौतियों का हल करने में सच में सक्षम है।

नहीं थमेगी डाबर की उड़ा
आयुर्वेद की बात करें और डाबर इंडिया का नाम न लें तो ऐसा ही लगेगा जैसे हम अभी क्रिकेट की बात धोनी के बगैर कर रहे हैं। धोनी अगर अभी नंबर वन ब्रांड बन गए हैं तो आयुर्वेद के क्षेत्र में डाबर इंडिया का भी यही स्थान है। धोनी आज डाबर च्यवनप्राश का प्रचार जरूर कर रहे हैं लेकिन डाबर को अपने क्षेत्र में अव्वल होने का खिताब उनसे बहुत पहले मिल चुका है। 

धोनी ही क्यों, बिग बी तक डाबर के प्रचार की कमान संभाल चुके हैं पर डाबर की विश्वसनीयता इन सितारों के बिना भी उतनी ही है। जाहिर है, सीरीफोर्ट में 7 अक्टूबर को ऑल इंडिया आयुर्वेद कांग्रेस के दौरान लगी प्रदर्शनी में इसी कंपनी ने ब्रांड के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज की। कंपनी को इस मुकाम तक पहुँचाने में कंपनी के उपाध्यक्ष अमित बर्मन की बड़ी भूमिका रही है।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री हासिल कर डाबर इंडिया लिमिटेड की कमान संभालने वाले कंपनी के उपाध्यक्ष अमित बर्मन एक पायलट भी हैं। उन्हें हवा में उड़ना बहुत अच्छा लगता है। अगर यह कहें कि अमित बर्मन की उड़ने की इसी ललक ने डाबर इंडिया लिमिटेड को आयुर्वेद की बुलंदियों पर पहुँचा दिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कहते हैं अमित बर्मन कंपनी के 'पायलट' हैं तो इसकी उड़ने की सीमा आकाश ही है। कोलकाता के बर्मन परिवार की कंपनी डाबर इंडिया लिमिटेड ने अब पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा दिया है। आयुर्वेदिक व प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में 125 साल की हो गई इस कंपनी का अब कोई सानी नहीं है। 

आयुर्वेद

डाबर इंडिया के 250 से अधिक उत्पादों की बाजार में तूती बोल रही है। दवाई से लेकर फूड तक में हर जगह डाबर मौजूद दिखता है। डाबर के उत्पाद पूरी दुनिया के 60 से अधिक देशों में उपलब्ध हैं। सिर्फ विदेश में ही इसका कारोबार 500 करोड़ रुपए का है। 

1884 में बर्मन परिवार ने जब एक छोटी आयुर्वेदिक दवा कंपनी के रूप में शुरुआत की थी तो 125 साल बाद यह नंबर वन कंपनी बन जाएगी किसी ने सोचा नहीं होगा। आज वह देश का हर्बल और नेचुरल प्रॉडक्ट की सबसे बड़ी पेशेवर कंपनी बन गई है।