Sunday, 7 September 2014

स्वस्थ, मस्त, जबर्दस्त

जो इंसान बिना दवाओं के मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ है , वही मस्त है और वही जबर्दस्त भी है। वैसे , सामान्य सेहत को ठीक बनाए रखने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। इसके लिए बस खानपान और एक्सर्साइज का ध्यान रखना है। कैसे-?

कराएं चेकअप

स्वस्थ रहने के लिए सबसे जरूरी चीज जो है , वह यह कि आपको अपनी सेहत से जुड़ी जानकारी होनी चाहिए। सेहत की न्यूनतम जांच कराना बहुत जरूरी है। इसके लिए आपको चार चीजों का पता होना ही चाहिए। ये चार चीजें हैं:

- अपनी ऊंचाई और वजन का पता करें। इससे आपको यह पता चलेगा कि आप ओवरवेट तो नहीं है।
- कॉलेस्ट्रॉल चेक कराएं और देखें कि कहीं यह सामान्य से ज्यादा तो नहीं है।
- ब्लड प्रेशर चेक कराएं और देखें कि यह हाई तो नहीं है।
- शुगर चेक कराएं।

ये चारों चीजें ऐसी हैं , जिनके लक्षण शुरू में दिखाई नहीं देते। अगर सब ठीक है तो अच्छी बात है , लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आगे भी ये दिक्कतें नहीं होंगी। थोड़े-थोड़े समय के बाद ये चेकअप दोबारा कराते रहना जरूरी है। एक 30 से 35 साल के स्वस्थ व्यक्ति को पांच साल में एक बार कॉलेस्ट्रॉल और हर तीन साल में शुगर का चेकअप कराते रहना चाहिए। बीपी हर छह महीने में एक बार चेक कराएं। 40 से ज्यादा उम्र हो जाए तो ये सभी टेस्ट थोड़े और जल्दी-जल्दी कराने चाहिए। अगर टेस्ट में कुछ दिक्कत है तो अपने डॉक्टर की सलाह से चलें। अगर सभी टेस्ट नॉर्मल आते हैं तो आपको दो चीजों की ओर ध्यान देना चाहिए। ये दो चीजें हैं: खानपान या डाइट और फिजिकल एक्सर्साइज।

कैसा हो खानपान
खानपान में एक सूत्र हमेशा ध्यान रखें। नाश्ता राजाओं की तरह करें , दोपहर का भोजन आम आदमी की तरह करें और रात का खाना भिखारियों की तरह खाएं। यानी ब्रेकफास्ट भरपेट करना है , लंच हल्का करना है और डिनर बहुत हल्का।

क्या न खाएं
- ब्रेकफास्ट के साथ चाय न पिएं। अगर पीनी ही है तो ब्रेकफास्ट के एक घंटे बाद ले लें। दिन में दो से तीन कप चाय ठीक है। इससे ज्यादा न लें।
- आपके खानपान में नॉनवेज ज्यादा नहीं होना चाहिए।
- ऑर्गन मीट , यानी कलेजी , से पूरी तरह परहेज करें। रेड मीट में फैट ज्यादा होता है इसलिए कभी-कभार ही लें और जब लें तो चर्बी उतारकर लें।
- चाहें तो अंडा ले सकते हैं। हफ्ते में दो या तीन एग येलो ले सकते हैं। इससे ज्यादा ले रहे हैं तो पूरा अंडा न लें। एग वाइट ही लें।
- रिफाइंड या प्रोसेस्ड चीजें न खाएं। मसलन कार्बोहाइड्रेट में आटा और मोटा चावल नैचरल और अनप्रोसेस्ड हैं , जबकि कॉर्न फ्लेक्स अगर आप खाते हैं तो वह प्रोसेस्ड है। - इसी तरह नूडल्स , पिज्जा , बर्गर , नमकीन , बिस्किट और बाकी तमाम पैकेटबंद चीजें प्रोसेस्ड हैं। इनसे जितना हो सके , बचें।
- बहुत ठंडी चीजें न खाएं , न ही ठंडा दूध पिएं।
- मैदा और सूजी से बनी चीजों को भी अच्छा नहीं माना जाता। मसलन काठी रोल , उत्तपम , उपमा आदि। अगर इन चीजों को बिना घी के बनाया जाए तो कभी-कभी ले सकते हैं।
- फ्राइड फूड नहीं लें। वनस्पति घी की बनी कोई चीज नहीं लें।
- मिठाई कम-से-कम खाएं , वह भी घर की बनी। तली हुई मिठाई जैसे जलेबी , इमरती , गुलाबजामुन आदि से बचें। बर्फी , छैना मिठाई ठीक हैं। मिठाई और नमकीन घर पर ही बनी हों , तो ही ठीक है।
- शराब न पिएं। अगर पीनी ही है तो एक दिन में 60 एमएल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
- स्मोकिंग और तंबाकू का सेवन जहर है। इनसे बचें।

1. ब्रेकफास्ट

ब्रेकफास्ट से करीब 10 से 12 घंटे पहले हमने कुछ खाया होता है। यानी 10 से 12 घंटे का फास्ट हो जाता है। ऐसे में सुबह शरीर को एनर्जी की जरूरत होती है जिसके लिए खाना जरूरी है।

कब करें
- उठने के बाद जितना जल्दी हो , ब्रेकफास्ट कर लें।
- मोटे तौर पर उठने के डेढ़ से दो घंटे के अंदर ब्रेकफास्ट कर लेना चाहिए।
- शुगर के मरीजों को फ्रेश होते ही कुछ खा लेना चाहिए।
- एक्सर्साइज करने के करीब पौने घंटे बाद ब्रेकफास्ट करना चाहिए।

ब्रेकफास्ट के कुछ अच्छे ऑप्शन
- गेहूं के आटे के साथ सोयाबीन , रागी या जई का आटा मिलाकर इसकी रोटियां बनाएं। इसमें दाल या पत्तेदार सब्जियों की स्टफिंग कर लें। परांठा बनाना है तो बहुत ही हल्का घी लगाएं , नहीं तो रोटी बेस्ट है। इसके साथ चटनी और छाछ ले सकते हैं। छाछ पसंद नहीं है तो रोटी खा लेने के बाद दूध ले सकते हैं। दूध बिल्कुल फैट फ्री न हो , टोंड दूध बेस्ट है।
- बाजरे , जई , चौलाई या गेहूं का दलिया पानी में बना लें। उसमें दूध मिलाकर ले लें। नमकीन दलिया भी बना सकते हैं , जिसमें पत्तेदार सब्जियां डाली जा सकती हैं।
- सैंडविच बनाने के लिए मल्टिग्रेन ब्रेड और खूब सारी ताजा सब्जी लें। होल वीट या मल्टिग्रेन बेड में ताजा सब्जी या पनीर की स्टफिंग से बना सैंडविच बढ़िया है। साथ में दूध ले सकते हैं।
- बेसन या मूंग की दाल का चीला ले सकते हैं। चीले पर घी बहुत हलका लगाएं। इसके साथ दही या छाछ का प्रयोग करें।
- स्प्राउट्स या अंकुरित अनाज और दालों की चाट बनाकर खाएं। स्प्राउट्स को मल्टिग्रेन या होल वीट ब्रेड के अंदर भरकर सैंडविच भी बना सकते हैं।
- पोहा या उपमा में अगर सब्जियां मिला ली जाएं तो यह पौष्टिक हो जाता है। साथ में छाछ या दही ले सकते हैं।

2. लंच

- लंच में परंपरागत भारतीय भोजन ठीक रहता है क्योंकि उससे सभी प्रमुख ग्रुप कवर हो जाते हैं।
- लंच में एक छोटी प्लेट सलाद , चपाती (गेहूं , जई , चना आदि के मिक्स्ड आटे से बनी) , एक कटोरी दाल और एक कटोरी दही ले सकते हैं। अगर चावल लेना चाहते हैं तो वे एक्स्ट्रा न हों। यानी चावल लेने हैं तो रोटी कम खाएं। इससे अनाज , सब्जी और दूध तीनों प्रमुख हिस्से कवर हो जाते हैं।
- खाने के बाद कोई एक पीस फ्रूट ले लें। खाने के बाद एक डली गुड़ खा लें।

3. शाम को स्नैक्स
- शाम को पांच बजे के आसपास हलके स्नैक्स लेने जरूरी हैं। उस वक्त शरीर को ऊर्जा की जरूरत होती है।
- ये स्नैक्स पैकेटबंद न हों। बिस्किट , नमकीन , चिप्स , समोसा , पकोड़ी आदि चीजों से बचें।
- इस वक्त आप भुने चने और गुड़ ले सकते हैं , सीजन है तो शकरकंदी ले सकते हैं , कॉर्न ले सकते हैं या फल भी लिए जा सकते हैं। सुबह नाश्ते में स्प्राउट्स नहीं लिए हैं , तो इस वक्त स्प्राउट्स भी लिए जा सकते हैं।
- एक मुट्ठी सूखे मेवे भी ले सकते हैं।

4. डिनर

- डिनर लगभग वैसा ही होगा , जैसा लंच , लेकिन लंच के मुकाबले मात्रा कम रखें।
- सोया बड़ी , परवल , करेला , लौकी या दूसरी पत्तेदार सब्जियों के साथ चपाती खाएं। कच्ची चीजों या सलाद को खाने का अंग बनाएं।
- डिनर के बाद अगर मीठा खाने का मन करता है तो कोई हलका मीठा ले सकते हैं , जैसे एक पीस चॉकलेट , खीर या मिठाई का पीस , गुड़।
- दही , चावल और मूली का प्रयोग रात के वक्त करने से बच सकें तो अच्छा है।

जरूरी है एक्सर्साइज/योग

एक्सर्साइज
- एक्सर्सारइज करते हैं तो ठीक है। नहीं करते , तो शुरू करें।
- ओवरवेट लोग ज्यादा उछलकूद वाली एक्सर्साइज न करें।
- कोई भी एक्सर्साइज , वॉक या टेडमिल पर वॉक सही है , लेकिन यह शूज पहनकर ही करें। इससे घुटने बेकार नहीं होंगे।
- एक्सर्साइज हफ्ते में कम-से-कम पांच दिन जरूर करें। सातों दिन करें तो और अच्छा है।
- एक्सर्साइज थोड़ी मुश्किल होनी चाहिए। बिल्कुल आसान या बहुत कठिन एक्सर्साइज करने से कोई फायदा नहीं है। इसके लिए नियम यह है कि अपनी क्षमता का 60 से 80 पर्सेंट तक इस्तेमाल करें।
- दो तरह की एक्सर्साइज होती हैं: ऐरोबिक और इक्विपमेंट के साथ। इक्विपमेंट के साथ या जिम करते समय ध्यान रखें कि हेवी वेट नहीं करना है।
- ब्रिस्क वॉक बहुत अच्छी है। सुबह के वक्त रोज करें। शुरू में धीरे-धीरे करें और फिर उसे बढ़ाकर 6 किमी प्रति घंटा तक ले जाएं। 15 मिनट रोजाना कर लें। घुटनों में दर्द हो तो न करें।
- लिफ्ट का प्रयोग बिल्कुल बंद कर दें और सीढ़ियों से जाएं और आएं। ध्यान रहे कि सीढ़ियां उतरने और चढ़ने दोनों में इस्तेमाल करनी है।

योग
- योग के लिए 45 मिनट का समय निकालें। जिसमें 15 मिनट तक खुली हवा में टहलें और फिर 30 मिनट का योग कर लें। इस 30 मिनट में ये क्रियाएं इसी क्रम में कर सकते हैं: कपालभाति , अग्निसार क्रिया , ताड़ासन , तीन राउंड सूर्य नमस्कार , लेटकर उत्तानपादासन , मर्कटासन , पवनमुक्तासन , भुजंगासन , बैठकर मंडूकासन , अनुलोम विलोम प्राणायाम , भस्त्रिका , भ्रामरी। इसके बाद थोड़ी देर शवासन।
- ऑफिस में काम के दौरान कुछ समय निकालें और ये क्रियाएं रोजाना करें: हाथों की सूक्ष्म क्रियाएं , गर्दन की सूक्ष्म क्रियाएं , कमर की घुमाने की एक्सर्साइज , आंखों की सूक्ष्म क्रियाएं।
- डिनर के बाद 15 मिनट टहल लें।

योग या एक्सर्साइज या दोनों ?
- अगर जिम जाना चाहते हैं या ऐरोबिक एक्सर्साइज करना चाहते हैं या कोई और एक्सर्साइज शेड्यूल है तो योग और इस एक्सर्सारइज को सुबह-शाम में बांट लें। सुबह योग कर लें और शाम को जिम या एक्सर्साइज कर सकते हैं। अगर वक्त है और सुबह के ही वक्त जिम और योग दोनों करना चाहते हैं तो आपको पहले जिम/एक्सर्साइज और बाद में योग करना चाहिए।
- डॉक्टरों का कहना है कि योग से भी ज्यादा जरूरी एक्सर्साइज है। आयुर्वेद भी एक्सर्साइज , यानी सूर्य नमस्कार , को करने की सलाह देता है यानी एक्सर्साइज जरूर करनी है , उसके बाद समय मिले तो योग भी करें।

स्ट्रेस करें कंट्रोल
सेहतमंद रहने के लिए तनावमुक्त रहना बेहद जरूरी है। जरूरत से ज्यादा तनाव अपने आप में एक बीमारी है। ऐसे में या तो स्ट्रेस देने वाली स्थिति को बदल डालें और या फिर उस स्थिति पर रिऐक्ट करने का अपना तरीका बदल दें। इसके लिए चार तरीके हैं। देखिए , आपको कौन-सा सूट करता है और फिर उसे ट्राई कीजिए।

- स्ट्रेस देने वाली चीजों को अवॉइड करें: जो लोग आपकी जिंदगी में स्ट्रेस की वजह हैं , उन्हें अवॉइड करें। अगर किसी खास विषय पर किसी खास आदमी के साथ आपकी बहसबाजी हो जाती है तो उस विषय के आते ही खुद वहां से हट जाएं। कोशिश कीजिए कि वे मुद्दे आपके डिस्कशन का हिस्सा न बनने पाएं।

- अवॉइड नहीं , तो तरीका बदलिए: अगर कुछ भी आपको परेशान कर रहा है तो मन में न घुटें। सही तरीके से अपनी बात रखें , नहीं तो गुस्सा मन में इकट्ठा होता जाएगा। दूसरों को बदलने की कोशिश करने से पहले खुद को भी थोड़ा बदलें। जिंदगी में हार न मानें। समस्या है तो उसे हल करने के लिए उससे आमने-सामने भिड़ें।

- स्थिति नहीं बदली , खुद को बदल लें: समस्या को देखने के अपने नजरिए में बदलाव लाएं। ट्रैफिक जाम में फंसे हैं तो परेशान होने के बजाय कोई अच्छी-सी किताब पढ़ें , अपना फेवरिट म्यूजिक सुनें या लोगों से बातचीत करें। समस्या को विस्तृत नजरिए से देखें। सोचें कि यह समस्या कितने दिन रहेगी ? दो दिन ? एक महीना ? दो महीना ? या फिर एक साल ? आखिरकार उसे खत्म होना ही है। अपने जीवन से ' हमेशा ', ' कभी नहीं ', ' यही होना चाहिए ' जैसे शब्दों को निकाल फेंके।

- बदल नहीं सकते , तो स्वीकार कीजिए: किसी प्रिय की मौत हो जाना , गंभीर बीमारी हो जाना , नौकरी छूट जाना या बिजनेस में घाटा हो जाना ऐसी समस्याएं जिन पर किसी का कोई जोर नहीं। ऐसी चीजों को जितनी जल्दी हो सके , स्वीकार कर लें। दूसरों का बर्ताव आपके काबू से बाहर की चीज है , इसलिए उसे बदलने की कोशिश करने की जगह उस पर रिऐक्ट करने का तरीका बदल डालें। कोई एक ऐसा शख्स जीवन में शामिल करें , जिससे आप मन की बात खुलकर कह सकें।

- और सबसे बड़ी बात , अगर सब कुछ ठीक चल रहा है , सेविंग हो रही है और जरूरी खर्च पूरे हो रहे हैं तो जरूरत से ज्यादा पैसे के पीछे न भागें। बादशाह बनने की कोशिश न करें और जिंदगी में सुकून लाएं।

कैसी हो दिनचर्या
हर इंसान के काम का शिड्यूल अलग-अलग होता है इसलिए सभी के लिए एक जैसी दिनचर्या नहीं हो सकती , लेकिन आयुर्वेद के मुताबिक एक आदर्श दिनचर्या यह हो सकती है।

सुबह 6 बजे
- नींद से जागें। उठते ही एक गिलास पानी पिएं। यह पानी रात को तांबे के बर्तन में रखा हुआ हो तो और अच्छा है। ताजे पानी में नीबू और शहद मिलाकर भी ले सकते हैं।
- फ्रेश हों , स्नान करें और उसके बाद अपनी सुविधा के मुताबिक योग/एक्सर्साइज करें। हफ्ते में एक दिन वक्त निकालकर नहाने से पहले शरीर की तिल के तेल , सरसों के तेल या नारियल तेल से मालिश कर लें। उसके आधा घंटा बाद नहाएं। सदिर्यों में तेल को गुनगुना कर सकते हैं।

सुबह 8 बजे
- ब्रेकफास्ट करें।
- मेट्रो से ऑफिस जाते हैं तो एस्कलेटर्स का प्रयोग करें। ऑफिस पहुंचने में भी लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। चढ़ना और उतरना दोनों सीढ़ियों से होने चाहिए। ऑफिस में फोन का प्रयोग कम करें। किसी के पास जाना है तो खुद उठकर जाएं। चाय के लिए कैंटीन खुद जाएं। पानी खुद भरकर लाएं। इससे हलका श्रम होता रहेगा।

सुबह 11 बजे
- अगर इच्छा है तो कुछ हलका-फुलका ले सकते हैं। अगर सुबह चाय नहीं ले सके हैं तो इस वक्त चाय पी सकते हैं।
- ऑफिस में दो घंटे से ज्यादा लगातार न बैठे रहें। हर दो घंटे में थोड़ी चहलकदमी करें और आंखों को आराम दें।

दोपहर 1 बजे
- लंच करें। पानी लंच से एक घंटा पहले पी लें या लंच करने के एक घंटे बाद लें।

शाम 5 बजे
- ऑफिस में ही गर्दन , आंखों और कमर की सूक्ष्म क्रियाएं कर लें।
- इस वक्त तक आते-आते एनर्जी लेवल कम होने लगता है। इसलिए इस वक्त कुछ हलका-फुलका ले लें। चाय ली जा सकती है।

शाम 7 बजे
- ऑफिस से सीधे घर। रास्ते में मॉल , मस्ती आदि कुछ नहीं।
- घर आकर थोड़ा आराम। इच्छा हो तो थोड़ी ब्रिस्क वॉक कर सकते हैं।

रात 9-9:30 बजे
- डिनर। खाना खाते हुए टीवी न देखें।
- डिनर के बाद 15 मिनट के लिए टहल लें।

रात 10-11 बजे
- बिस्तर पर जाएं।
- ईश्वर का धन्यवाद करें। कोई अच्छी किताब पढ़ सकते हैं और सो जाएं।


लहसुन की एक कली और पांच नीम की पत्ती सुबह खाली पेट रोजाना लें। लहसुन रक्त को पतला बनाता है और ब्लडप्रेशर को सही रखती है। नहाने से पहले अपने शरीर की मालिश तिल के तेल से करें। इससे शरीर में रक्त संचार ठीक बना रहता है।  


 अनार का जूस कॉलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में सहायक है। लौकी का जूस वजन कम करता है। 

 

Wednesday, 5 March 2014

सीओपीडी - 21 वीं सदी का आतंक

(सी.ओ.पी.डी. के अधिकांश मरीजों में रोग का कारण धूम्रपान, लकड़ी, कण्डे, घास-फूस आदि ईंधन के जलने का धुआं व वायु प्रदूषण आदि ऐसे कारक हंै जिनसे बचाव करके रोग से बचा जा सकता है। यह सच है कि सी.ओ.पी.डी. के रोगी को पूणतया रोग मुक्त नहीं कर सकते परन्तु आधुनिक इलाज से रोगी लगभग सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। लेखक ने अपने लम्बे अनुभव का उपयोग करते हुए आमजन व मरीजों के मन में रोग के कारणों, निदान, उपचार एवं बचाव के बारे में उत्पन्न शंकाओं का समाधान सुझाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है जो इस रोग के प्रति जनचेतना जगाने में सहायक होगा।
यदि गौर करें तो सांस लेना इतनी आसान शारीरिक क्रिया है कि हमारा इस ओर कभी ध्यान ही नहीं जाता है। लेकिन करोड़ों सांस के रोगियों के लिए तकलीफ के समय एक एक सांस लेना भी बहुत कठिन और दुष्कर कार्य होता है। सांस या दमा की तकलीफ दो प्रकार के फेफड़ों के रोग के कारण होती हैः अस्थमा एंव सीओपीडी। बचपन से शुरू होने वाला अस्थमा एक ऐसा रोग है जिसमें एलर्जी के कारण रोगी की श्वास नलियां सिकुड़ जाती है और इससे तकलीफ हो जाती है। अस्थमा से मिलती जुलती दूसरी बीमारी है सीओपीडी। प्रौढ़ावस्था में होने वाला सीओपीडी रोग अस्थमा से कहीं ज्यादा पीड़ादायक एवं घातक है।क्या अस्थमा और सीओपीडी एक ही बीमारी है?
इन दोनों ही बीमारियों को हम हिन्दी भाषा में दमा के नाम से जानते हैं इसलिए यह भ्रांति है। दोनों बीमारिया फेफड़ों की हैं सिर्फ यही बात एक सी है, अन्यथा यह दोनों ही बीमारिया अलग-अलग हैं। दोनों बीमारिया होने की उम्र, कारण, रोग की गंभीरता, जीवन को खतरा सभी में काफी भिन्नता है। करीब 3 करोड़ लोगों को हमारे देश में अस्थमा है। जबकि सीओपीडी से ग्रसित लोगों की संख्या इससे भी अधिक है।
अस्थमा एंव सीओपीडी की भिन्नता टेबल में बताई गई है।
 दमासीओपीडी
उम्र शुरूबचपनबड़ी उम्र (> 40 साल)
उत्तेजक एलर्जी कारकधूल, पराग कण, पालतू पशुओं, कवककोई एलर्जी उत्तेजक कारक
अन्य कारणधुआँ, सर्दी, गले संक्रमण, परेशान गंधशीत, वायरल संक्रमण और प्रदूषण
मुश्किल साँस लेने का समयनींद के दौरान रात में या में सुबहपरिश्रम के बाद
अन्य संबद्ध लक्षण या बीमारीआंखों में खुजली, छींकने चल नाक और पित्तीदिल की बीमारी, पतली हड्डियों
कारणमाता पिता, भाई बहनों में एलर्जी रोगधूम्रपान तम्बाकू का सेवन। धूल-धूऐं वाले वातावरण में रहना।
क्या सीओपीडी नया रोग है?
सीओपीडी रोग नया नहीं है इस बीमारी को लोग विभिन्न नामों से जानते हैं। ब्रांकाइटिस, एम्फीजीमा, दमा आदि कुछ ऐसे नाम हैं जो सीओपीडी रोग को इंगित करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भांति भांति के नामों से होने वाली भ्रांतियों को समाप्त करने हेतु अब इस बीमारी को सीओपीडी के नाम से जानने का निश्चय किया है एंव 17 नवम्बर 2004 को विश्व सीओपीडी दिवस मनाने का फैसला किया है।
सीओपीडी का पूरा नाम है क्रोनिक आब्सट्रक्टिव पलमोनरी डीजीज।
¬ क्रोनिक - लम्बे समय तक चलने वाली
¬ आब्सट्रक्टिव - रूकावट वाली
¬ पलमोनरी - फेफड़ों की
¬ डीजीज - बीमारी
क्या सीओपीडी एक खतरनाक बीमारी है?

जहा तक रोग से मुत्यु का सवाल है आंकडे बताते हैं कि हमारे देश के ग्रामीण अंचलों में सीओपीडी मौत का सबसे बडा कारण है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के मृत्यु के आंकडों के विभाग के अनुसार सीओपीडी से ग्रामीण भारत में करीब 12 प्रतिशत लोगों की मृत्यु होती है जबकि दूसरे सबसे बड़े कारण हार्ट अटैक से 8 प्रतिशत लोग मरते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन 2000 के अनुसार भारत में सीओपीडी से मरने वालों की संख्या कैन्सर, मधुमेह, हार्ट अटैक और लकवे से मरने वालों की कुल संख्या से भी अधिक है। विश्व में सीओपीडी मौत का छठा सबसे बड़ा कारण है लेकिन 2020 तक आशंका है कि मौत के कारणों में इसका स्थान तीसरा होगा। सीओपीडी न केवल मौत का ही कारण है बल्कि मानव पीड़ा का भी यह एक बहुत बड़ा कारण है। तेज़ सीओपीडी रोग से ग्रसित व्यक्ति कुछ कदम चलने के लिए भी तरस जाता है। थोड़ा चलते ही सांस बेकाबू हो जाता है। दैनिक जीवन के साधारण काम जैसे स्नान करना, शौच जाना जैसे काम करते समय भी रोगी सांस में तकलीफ के कारण छटपटा उठता है। ऐसे रोगियों का जीवन चारपाई पर ही बीतता है। तेज बीमारी में बैठने, करवट बदलने यहा तक की खांसते समय भी असाध्य पीड़ा होती है। ऐसी स्थिति में कार्य के समय सांस में होने वाली पीड़ा का अन्देशा दिलोदिमाग पर ऐसा छाता है कि व्यक्ति और कुछ सोच ही नहीं पाता है।
क्या सीओपीडी एक छुआछूत की बीमारी है?

किसी भी प्रकार के सम्पर्क से सीओपीडी रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लग सकता। साथ-साथ खाना खाने, खेलने, एक ही बिस्तर पर सोने, आपस में बातचीत करने से भी सीओपीडी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं हो सकता।
सीओपीडी किन लोगों को होता है?

जीवन चलाने के लिए सबसे आवश्यक तत्व है श्ुाद्ध हवा। ईश्वर दयालु है जिसने हमें प्रचुर मात्रा में शुद्ध हवा दी है और वह भी बिल्कुल मुफ्त। लेकिन विडम्बना यह है कि बहुत से लोग इस बात के महत्व को नहीं जानते और इस प्राणवायु में धूम्रपान अथवा प्रदूषण के धूएं की मिलावट कर बैठते हैं। धूएं से मिलावटी सांस जब सांस नलियों एंव फेफड़ों में जाता है तो उन लोगों में विकार पैदा कर देता है। निरन्तर लम्बे समय तक इस धूएंदार सांस को लेने पर फेफड़ों में गम्भीर बीमारी सीओपीडी उत्पन्न हो जाती है। सीओपीडी साधारणतया 40 साल की उम्र के बाद होता है। बच्चों में यह बीमारी नहीं होती है।
सीओपीडी के कारण क्या हैं?

धूम्रपान के धूएं की मिलावट फेफड़ों के लिए बहुत घातक होती है। सीओपीडी के 80 प्रतिशत रोगी वे होते हैं जो धूम्रपान करते हैं। 20 प्रतिशत सीओपीडी के रोगी हालांकि धूम्रपान नहीं करते फिर भी रोग से ग्रसित होते हैं क्योंकि वे धूएं वाले वातावरण में रहते हैं। इनमें लकड़ी अथवा उपले से खाना बनाने वाली महिलायें, धुआं उगलने वाले कारखानों में काम करने वाले लोग एंव वाहनों के धुएं से प्रदूर्षित बाजारों एंव सड़कों के आस-पास रहने व काम करते लोग।

तंबाकू प्रेरित रोगलाख मेंप्रतिशत
सीओपीडी1.2523%
कैंसर1.0018%
हृदय रोग (सीएडी)0.8515%
पक्षाघात (CVA)0.458%
फेफड़ों में संक्रमण0.204%
टीबी0.153%
संबंधित अन्य तंबाकू रोगों1.6029%
 5.5 (दस लाख)100%


सीओपीडी रोग के क्या लक्षण हैं?

Φ लम्बे समय तक कफ, बलगम, खंखार बनना
Φ खा सी
Φ सर्दियों में खांसी होना
Φ मेहनत के समय सांस फूलना।
धूम्रपान करते व्यक्ति में यदि उपरोक्त लक्षण बार-बार हों, तो सोचना चाहिये कि सीओपीडी रोग की शुरूआत हो चुकी है।
सीओपीडी रोग का पक्का पता क्या एक्सरे से लगता है?

अक्सर सीओपीडी के रोगी को जब शुरूआती लक्षण होते हैं तो एक्सरे करवाया जाता है लेकिन सीओपीडी रोग में एक्सरे अक्सर सामान्य ही होता है। इस रोग की शुरूआत का अथवा गम्भीरता का पता लगाने के लिए स्पाईरोमीटर नामक टेस्ट करवाने की जरूरत होती है। आम आदमी ही नहीं बल्कि बहुत से चिकित्सक भी इस टेस्ट से अनभिज्ञ होते हैं। टेस्ट नहीं होने के कारण रोग का पता प्रारम्भिक अवस्था में नहीं लग पाता है। टैस्ट के बिना रोग का पता तक लगता है जब बीमारी गंभीर अवस्था में पहु च जाती है।
क्या सीओपीडी रोग लाइलाज है?

‘‘दमा-दम के साथ जाता है‘‘ एक बार दमा होने के बाद जीवन भर तड़प तड़प कर ही जीना पड़ता है‘ जैसी विचार धारायें न केवल रोगी मानते हैं बल्कि अधिकांश चिकित्सक भी इससे सहमत होते हैं। एक बार सीओपीडी होने पर यह सही है कि अधिकांश रोगियों में यह रोग जड़ से खत्म नहीं होता। लेकिन यह भी सही है कि सही प्रकार से इलाज लेने पर लगभग सभी रोगी तकलीफ मुक्त, सुखद जीवन जी सकते हैं। नई प्रकार की दवाइया एंव इलाज, कम से कम सांस में होने वाली भयंकर वेदना से तो राहत दिला ही सकता है। यदि अन्य रोगों से तुलना की जाये तो ईलाज से सीओपीडी में कम से कम इतना फायदा अवश्य होता है जितना फायदा दवाईयों से अन्य रोगों जैसे ब्लड प्रेशर, ह्रदय रोग, गठिया, डायबिटीज में होता है।
समय के साथ-साथ सीओपीडी रोग की गम्भीरता क्यों और कैसे बढती है?

जो रोगी धूम्रपान छोड़ देते हैं उनमें रोग की गम्भीरता में कमी अवश्य आती हैं लेकिन रोग बना रहता है। शुरूआत में खांसी और बलगम ही सीओपीडी के लक्षण होते हैं। सीओपीडी होने के बाद भी जो रोगी धूम्रपान नहीं छोडते अथवा धूएंदार सांस लेते रहते हैं ऐसे लोगों में सीओपीडी की गम्भीरता धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। सांस फूलनें की शुरूआत का अर्थ है सीओपीडी रोग का प्रारंभिक अवस्था से गंभीर अवस्था में प्रवेश। यदि व्यक्ति धूम्रपान करता रहता है तो श्वास नलियों एंव फेफड़ों के ऊतक एक प्रकार जल कर नष्ट हो जाते हैं। इससे फेफड़ों की क्षमता कम होने लगती है। फेफड़ों में रिजर्व क्षमता बहुत होती है इसलिये फेफड़ों की क्षमता में 30-40 प्रतिशत की कमी तक भी रोगी को सिर्फ खांसी-बलगम की ही तकलीफ होती है। रोग के आगे बढ़ने पर सांस में तकलीफ हर समय रहने लगती है। हम सांस लेते हैं फेफड़ों के द्वारा आॅक्सीजन शरीर के अन्दर लेने और कार्बन डाई आॅक्साइड को बाहर निकालने के लिए। जब फेफड़ों के ऊतक नष्ट हो जाते हैं तो फेफड़े शरीर की जरूरत के अनुपात में आक्सीजन नहीं पहु चा पाते हैं तथा शरीर में आॅक्सीजन की कमी एंव कार्बन डाई आॅक्साइड बढ जाती है। सीओपीडी की इस गंभीर अवस्था को ‘रेस्पीरेटरी फेल्योर‘ कहते हैं। जिस प्रकार ह्रदय फेल होने को हार्ट फेल्योर कहते हैं उसी प्रकार फेफड़ों के फेल होने को ‘रेस्पीरेटरी फेल्योर‘ कहते हैं। ऐसी अवस्था में रोगी कुछ कदम चलने पर ही बेहाल हो जाता है। स्नान करना, शौच जाना जैसे दैनिक कार्याें के लिए भी उसे मदद लेनी पड़ती है। आॅक्सीजन की ओर कमी होने पर रोगी को हर सांस के लिए संघर्ष करना पड़ता है। साधारण व्यक्ति को दौड़ते समय जितनी ताकत या एनर्जी लगानी पडती है, तेज सीओपीडी के रोगी को उतनी ताकत या एनर्जी आराम से बैठी अवस्था में भी सांस लेने में खर्च करनी पड़ती है। इसलिये ऐसी अवस्था में रोगी का वजन घटता जाता है और वह हडडीयों का ढा चा मात्र रह जाता है।
कितने वर्षों तक धूम्रपान करने पर ‘सीओपीडी बीमारी‘ होती है?

अलग-अलग लोगों में धूम्रपान की अलग-अलग मात्रा लेने के बाद सीओपीडी रोग शुरू होता है। अक्सर देखा गया है कि 15-20 वर्षों तक धूम्रपान करने के बाद सीओपीडी रोग की शुरूआत होती है। फेफड़े शरीर के बहुत मजबूत अंग होते हैं, 15-20 वर्ष तक तो वे धूएंदार हवा बिना विकार के सहन कर लेते हैं । इसके बाद धुएंदार हवा सांस में जाने पर श्वासनलियों में सूजन और बलगम बनने लगता है। इसलिये शुरू के कई वर्षों तक बलगम ज्यादा आने की तकलीफ ही एक मात्र सीओपीडी का लक्षण होता है। इसके बाद के वर्षों में चलती आ रही है। जब भी कोई आदमी हवेली या घर के अन्दर जाता है तो जोर से खांसने की आवाज करता है (खंखारा करना) जिससे घर की महिलायें पर्दा कर लें। खंखारा करने के साथ ही फेफड़ों में जमा बलगम निगला जाता है और पेट में चला जाता है। इस दौरान इस व्यक्ति को पता भी नहीं चल पाता की उसे बलगम या कफ बनने की तकलीफ है। ग्रामीण महिलायें भी बलगम की तकलीफ नहीं बताती हैं आम जीवन में खांसना-कफ बाहर फेंकना महिलाओं में अच्छा नहीं माना जाता, इसलिये खांसने के साथ आने वाले बलगम को महिलायें बिना आभास के ही निगल जाती हैं। इस प्रकार रोग की प्रारंभिक अवस्था बिना आभास के निकल जाती है। रोगी धूम्रपान करता रहता है एंव रोग गंभीरता की ओर बढ़ता जाता है।
प्रारंभिक अवस्था में सीओपीडी का उपचार क्या है?

सीओपीडी की किसी भी अवस्था में रोग की गम्भीरता में कमी लाने का सबसे महत्वपूर्ण कदम है - धूम्रपान छोडना एंव धूएंदार हवा से सांस को बचाना। धूम्रपान छोडने के बाद फेफड़ों की अवस्था में सुधार आता है। नियमित व्यायाम और पौष्टिक आहार जैसे फल, प्रोटीन और हरी सब्जिया रोग में आराम दिलाने में मदद करते हैं।
ईलाज से सीओपीडी की तकलीफ में क्या लाभ मिल सकता है?

इलाज लेने से तकलीफ में निम्न प्रकार से लाभ मिल सकता है।
Φ सांस लेने से होने वाली तकलीफ में कमी
Φ खांसी में कमी
Φ कफ-बलगम में कमी
Φ शारीरिक क्षमता में वृद्धि
Φ दैनिक कार्य करने में होने वाली कठिनाई में कमी
गंभीर अवस्था में सीओपीडी का उपचार क्या है?

Φ बीमारी नहीं बढे़ः
रोगी को चाहिये की धूम्रपान को पूरी तरह से बन्द कर दे। ऐसी अवस्था में एक बीड़ी या एक चिलम प्रतिदिन भी घातक है।
Φ तकलीफ में आरामः
चिकित्सक की सलाह से दवा अवश्य लें। आजकल इन्हेलर के माध्यम से ली जाने वाली कई असरदार दवाइया बाजार में उपलब्ध हैं। इनको लेने से सांस की तकलीफ में आराम मिलता है।
Φ शारीरिक परिश्रम की क्षमता में वृद्धिः
विशेष प्रकार के व्यायाम मिला कर रेस्पीरेटरी रिहेबीलिटेशन प्रोग्राम बनाया गया है। इंडियन जर्नल आफ चेस्ट डीजिज में प्रकाशित हमारे शोध के अनुसार इस प्रकार के व्यायाम करने से सीओपीडी की गम्भीर रोगियों की शारीरिक क्षमता में भी काफी वृद्धि पाई गई।
Φ तेज दौरे से बचाव के तरीके (सर्दियों में विशेष तौर से निम्न का ध्यान रखें)
• इनफेक्शन के लिए वैक्सीन का उपयोग
• जुकाम-खांसी वाले लोगों से दूर रहें
• ठण्ड से बचें
• गर्म कपडे पहने।
• स्कूटर पर जाते समय अथवा ठण्ड में जाते समय गले में उन से बना हाई नेक पहने
• पैरों में गर्म मौजे पहने
• खुले में स्नान नहीं करें
• सर्दियों में गर्म पानी से स्नान करें।
• महिलायें बाल धोकर ड्रायर से सुखायें।
• ठंडी- खटटी अथवा चिकनी चीजों पर ठण्डा पानी नहीं लें। जैसे ठण्डा खट्टा दही या छाछ। मिठाई लेने के बाद भी ठण्डा पानी ना पीयें।
• दोपहर बाद धूप हटने पर देर तक कमरे से बाहर नहीं बैठें।
• बरसात में नहीं भीगें।
• जुकाम- खांसी होते ही एन्टीबायोटिक्स का इलाज लें।

Φ निम्न दवा कभी भी नहीं लेंः

प्रोपेनोलोलः (इंडेरोल, सिपलार) ब्लड प्रेशर कम करने वाली दवा नींद की गोलीः गम्भीर सीओपीडी के रोगियों में आॅक्सीजन की कमी और कार्बन डाई आक्साइड के बढने से बैचैनी, घबराहट एंव नींद नहीं ओने जैसी तकलीफ होने लगती है। ऐसे में कभी भी नींद की गोली नहीं लें। नींद की गोली ऐसी अवस्था में प्राणघातक सिद्ध हो सकती है। रेस्पीरेटरी फेल्योर- बहुत गम्भीर सीओपीडी के रोगियों के रक्त में आॅक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे वे रेस्पीरेटरी फेल्योर की अवस्था में आ जाते हैं। इनमें से कुछ रोगियों में कार्बन डाईआक्साइड सामान्य ही रहती है, ऐसे रोगी घर पर आॅक्सीजन लेकर सांस तकलीफ से आराम पा सकते है। आॅक्सीजन सिलेन्डर अथवा आक्सीजन कन्सन्ट्रेटर ली जा सकती है। बडे शहरों में आॅक्सीजन कम्पनियों दो से तीन हजार रूपये सिक्योरिटी लेकर बड़ा सिलेन्डर दे देती है। यह कम्पनियां घर पर सिलेन्डर भरने की सुविधा भी 200-300 रूपये में कर देती हैं। दूसरा तरीका है ‘आॅक्सीजन कनसन्टेªटर‘ से। यह एक मशीन होती है जो वातावरण से आक्सीजन निकाल कर रोगी को दे देती है। हालांकि यह 50-70 हजार रूपये में आती है। लेकिन लम्बे समय तक आॅक्सीजन लेने पर सस्ती पड़ती है। रेस्पीरेटरी फेल्योर से ग्रसित सीओपीडी के उन रोगियों में जिनमें आॅक्सीजन की कमी के साथ साथ कार्बन डाई आक्साइड भी बढ जाती है इनमें सिर्फ आक्सीजन लेने से तकलीफ कम होने की बजाय बढ़ जाती है। ऐसे रोगियों के लिए ‘बाईपैप‘ मशीन एक प्रकार से वरदान है। घर पर लगायें जाने वाली यह वैन्टीलेटर मशीन है। यह मशीन न केवल शरीर में आक्सीजन बढ़ाती है बल्कि कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा भी कम कर देती है। 

खतरे के चिन्हः

नियमित इलाज के बावजूद जब सीओपीडी के रोगियों में निम्न लक्षण आयें तो उन्हे तुरन्त चिकित्सक की सहायता लेकर नियमित के अतिरिक्त एमरजेन्सी इलाज लेना चाहिये।
Φ जुकाम-खांसी होना
Φ बलगम बढना
Φ बलगम का रंग पीला- हरा होना
Φ घबराहट, बैचेनी नींद नहीं आना
Φ बुखार होना
Φ सांस की गति तेज होना
Φ चलने पर ज्यादा सांस फूलना।
Φ ज्यादा नींद या गैर आना।

Monday, 27 January 2014

ब्डग्रुप के अनुसार डाइट

हम जो भी खाते है वो हमारे शरीर के रसायनो के साथ मिलकर प्रतिक्रिया करता है,इसका असर हमारे मन,शरीर पर अलग–अलग तरह से होता है।
हर व्यक्ति की आधारभूत संरचना अलग होने के कारण उनके शरीर की भोजन की मांग भी अलग होती है।
ब्लडग्रुप के अनुसार डाइट लेने से जो एंटीजन  हमारा शरीर बनाता हैऔर जो भोजन से प्रोटीन लेक्टिन प्राप्त होते है दोनों मिलकर हमारी रक्षा प्रणाली को बढा देते है।
हमारे ब्लडग्रुप को चार भागों में भिाजित किया गया है ओ,ए,बी,और एबी।
सभी ग्रुप के अनुसार अनुकूल डाइट को भी तीन भागों में बांटा गया है।
पहला– शरीर को अत्याधिक लाभ पहॅुंचाने वाला।
दूसरा–ऐसा भोजन जो शरीर को नुकसान नही पहुचाता।
तीसरा– ऐसा भोजन जो हमारे शरीर को नुकसान पहॅुंचाता है जो हमें नहीं लेना चाहिए।
 ब्लड ग्रुप– एसिड का मात्रा अधिक होती है गरीष्ठ भोजन मीठ मांस आसानी से पचा सकते है।
आलिव ऑयल,कददू के बीज,बीन्स,राजमा,पत्तेदार सब्जी,साग,पालक,अरबी,कददू,लहसुन,आलूबुखारा,अजमोद,सोडा आदि खाना चाहिए।

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Wednesday, 22 January 2014

शराब छोड़ने के उपाय



1) कहतें हैं कि शराब पीने की जिसे आदत पड़ जाती है, आसानी से नहीं छुटती, लेकिन होम्योपेथी में सेलेनियम-30 एक ऐसी दवा है, जिसके कुछ दिनों का सेवन करने के बाद शराब पीने वाले को शराब खराब लगने लगती है! एक दिन में तीन बार सेवन कि गई पहले दिन कि खुराकें ही आश्चर्यजनक लाभ पहुंचाती है और शराब पीने कि इच्छा समाप्त हो जाती है! पूरा लाभ पाने के लिए कुछ दिनों तक नियमित सेवन कराएं!

2) सेब का रस बार बार पीने से और भोजन के साथ सेब खाने से भी शराब कि आदत छुट जाती है! यदि उबले हुए सेबों को दिन में तीन बार खिलाया जाए, तो कुछ ही दिनों में शराब पीने कि लत छुट जाती है!

3) 500 ग्राम नई देसी अजवाइन को पीसकर उसे 7 लीटर पानी में दो दिन के लिए भिगो दें! फिर धीमी आंच पर इतना पकाएं कि पानी लगभग 2 लीटर रह जाए!
ठंडा होने पर छान कर बोतल में भर दें! शराब कि तलब लगने पर 5 चम्मच कि मात्रा में पीते रहने से भी शराब पीने कि आदत छुट जाती है!

4) शराब छुड़ाने में एक दवा ऐकेम्प्रोसेट ईजाद हुई है! इसे अब तक दस लाख से ज्यादा लोगों ने इस्तिमाल किया है और बेहतर परिणाम मिले हैं! इस दवा को फ्रांस में लें स्थित 'लिफा एस.ए कम्पनी ने बनाया है! फिलहाल ये दवा एशिया, यूरोप, दक्षिणी अमेरिका आदि के देशों में आसानी से उपलब्ध है!

सीने में दर्द के कारण



छाती दर्द का सबसे बड़ा कारण छाती की अंदरूनी दिवारों में सूजन का होना है। होता यह है जब फेफ़डे के ऊपरी सतह पर स्थित झिल्ली में सूजन आ जाती है तो छाती की अंदरूनी दीवार में स्थित सूजी हुई सतह से साँस लेते वक्त हवा रगड़ खाती है तो असहनीय दर्द होता है। इस अवस्था को मेडिकल भाषा में प्ल्यूराइटिस कहते हैं। यह प्ल्यूराइटिस छाती में पानी इकट्ठा होने का शुरूआती संकेत है। देश में प्ल्यूराइटिस का ज्यादातर कारण टीबी का इंफेक्शन होता है। लोग छाती दर्द के लिए दर्द निवारक गोलियों का सेवन करते रहते हैं और सही जाँच व इलाज के अभाव में समस्या को और गंभीर बना देते हैं। अगर प्ल्यूराइटिस की समस्या को सही समय पर नियंत्रित न किया गया तो छाती में फेफ़डे के चारों ओर पानी इकट्ठा हो जाता है। टीबी के अलावा न्यूमोनिया का इंफेक्शन भी इस अवस्था को पैदा कर देता है। इस तरह की समस्या पर किसी थोरेसिक सर्जन यानी चेस्ट सर्जन से परामर्श लें।


Sunday, 28 October 2012

पति पत्नी के बीच समस्याएं


दांपत्य जीवन में बहुत से ऐसे कारण होते हैं जिससे रिलेशनशिप में मनमुटाव की स्थिति पैदा हो जाती है। वैवाहिक जीवन की जटिलता को समझना मुश्किल है लेकिन सुखी दांपत्य जीवन के उपाय जरूर किए जा सकते हैं। विवाह के बाद पति-पत्नी कई बार अचानक आई जिम्मेदारियों का बोझ उठा नहीं पाते नतीजन, रिलेशनशिप में दरार आने लगती है। आइए जानते है पति-पत्नी के बीच समस्याओं के बारे में।
  • विवाह के बाद कई बार पति-पत्नी में किन्हीं कारणों से एक-दूसरे पर अविश्वास की स्थिति आ जाती है, ऐसे में पति-पत्नीं समझौता किए बिना या फिर काउंसलर की सलाह लिए बिना तलाक के अंजाम तक भी पहुंच जाते हैं।
  • सुखी दांपत्य जीवन के उपायों के लिए जरूरी है कि पति-पत्नी एक-दूसरे के महत्व को समझे और एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करें।
  • आज  पति-पत्नी के बीच समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं जिससे पति-पत्नी के बीच में मनमुटाव होना, संबंधों में कड़वाहट उत्पन्न होना, सेक्स से संबंधित समस्या होना तथा एक-दूसरे की सोच न मिल पाना, वैवाहिक जीवन में जटिलता, रिलेशनशिप्स में दरार आने के सा‍मान्य कारण हैं।
  • कई बार रिलेशपशिप में दरार ,साथी से बहुत ज्यादा अपेक्षा करने से भी आ सकती है। आप अपने साथी से जितनी अधिक अपेक्षाएं रखेंगे आपके संबंधों में उतनी ही समस्याएं बढ़ती जाएंगी। इसीलिए बेहतर यही है कि आप अपने काम को स्वयं अंजाम दें।
  • वैवाहिक जीवन को सफल बनाने के लिए पति-पत्नी को अपने साथी के अनुकूल अपने आपको ढालना चाहिए या उसकी पसंद-नापंसद का भी खास ख्याल रखना जरूरी होता है।
  • कई बार वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी दोनों में से किसी को सेक्स की कमजोरी हो या कोई सेक्‍स समस्‍या हो और एक-दूसरे की इच्छाएं पूरी न कर पा रहे हो तो भी पति-पत्नी के बीच समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। आपका साथी उस समय तो चाहे कुछ न कहें लेकिन उसकी भड़ास, चिडचिड़ाहट और झल्लाहट बाद में दिखाई दे सकती हैं।
  • बहुत से दम्पत्तियों के जीवन में साथियों की सोच तथा कार्य में मेल न हो पाने या रूचियों में अंतर के कारण आपस में प्रेम नहीं पनप पाता, जिससे दोनों में एक-दूसरे के प्रति असंतोष की भावना होने लगती है। नतीजन रिलेशनशिप में दरार पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
  • किसी एक साथी का अच्छी पोस्ट पर होने से भी रिश्तों में तनाव की समस्या पैदा हो जाती है यदि ऐसा होता है तो दोनों ही एक-दूसरे के कार्य से खुश नहीं होते और हर समय एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।
  • पति-पत्नी के सामान्य संबंधों में हस्तक्षेप करना, पति-पत्नी के संबंधों में किसी दूसरे का दखल या सेक्स से संतुष्ट न होने के कारण से किसी दूसरे को चाहना आदि कारणों से भी मनमुटाव हो जाता है और वैवाहिक जीवन में जटिलताएं आनी आरंभ हो जाती हैं।
रिलेशनशिप में मनमुटाव न हो, दांपत्य जीवन सुखमय हो, वैवाहिक जीवन जटिल न हो इसके लिए जरूरी है कि पति-पत्नी को अपनी समस्याओं के बीच किसी तीसरे को हस्तक्षेप न करते हुए समस्याओं का समाधान खुद निकालने की कोशिश करें।