Thursday, 6 September 2012

अनावश्यक मानसिक तनाव एक रोग

जीवन में हम बहुत सी शारीरिक और मानसिक बीमारियों से गुज़रते हैं। अनावश्यक तनाव भी इसी प्रकार की एक बीमारी है जो बहुत सी मानसिक चिंताओं जैसे जल्दी परेशान हो जाना, प्रतिदिन होने वाले कामों की चिंता करने से उत्पन्न हो जाती है। इस मानसिक तनाव के बहुत से प्रकार होते हैं जैसे- पैनिक डिस्ऑर्डर, ऑपसेसिव-कंपल्सिव डिस्ऑर्डर, फोबिया और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिस्ऑर्डर

कारण

मानसिक तनाव के बहुत से कारण हो सकते हैं जिनमें मस्तिष्क में पाए जाने वाले रसायनो का बढ़ना या घटना, इन्सोमेनिया, अत्याधिक तनाव, कोई बड़ा हादसा आदि
इनके साथ कई मेडिकल परिस्थितियाँ भी शामिल हो सकती हैं जैसे- हाईपोग्लायसीमिया या फिर कोई तनावपूर्ण कार्य या यह अनुवांशिक भी हो सकता है।

लक्षण

इस तरह के तनाव में शारीरिक लक्षणों के साथ-साथ भावनात्मक लक्षण भी देखे जाते हैं। भावनात्मक लक्षणों में डर,घबराहट,बुरे सपने यह फिर किसी पुराने हादसे की याद शामिल हो सकते हैं। इस तनाव से गुज़र रहे मरीज़ों में नींद कम आना, तेज़ हृदयगति, हाथों का ठंडा पड़ जाना आदि लक्षण देखे गए हैं।

उपाय

इसके इलाज के लिए कई विकल्प मौजूद हैं जिनमें दवाइयों के साथ फिज़ियोथेरेपी को भी शामिल किया जाता है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले बीमारी को ठीक से जाँच लेना ज़रूरी होता है इसलिए मनोविश्लेषक इसकी जाँच के साथ-साथ यह भी पता लगाते हैं कि यह बीमारी कहीं अनुवांशिक तो नहीं
निम्नलिखित मिलेजुले प्रयोग द्वारा इस बीमारी से निपटा जा सकता है - 



बिहेवियर थेरेपी (व्यवहार पद्धति) 

इस थेरेपी में मरीज़ के अवांछित बर्ताव पर नियंत्रण पाने की कोशिश की जाती है। मरीज़ इस थेरेपी के माध्यम से कठिन परिस्थितियों का सामना करना सीखता है। इसमें रिलेक्सेशन तकनीक द्वारा मरीज़ को अपना व्यवहार परिस्थिति के मुताबिक बदलना सिखाया जाता है।

कोग्निटिव थेरेपी

इस थेरेपी में मरीज़ के दिमाग में आने वाले बुरे विचारों पर नियंत्रण रखना सिखाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि इन विचारों से तकलीफदायक भावनाएँ ना उत्पन्न हों

कोग्निटिव-बिहेवोरियल थेरेपी

कई डॉक्टर दोनो पद्धतियों के संयोजन का भी प्रयोग करते हैं। इस थेरेपी से मरीज़ जल्दी बेहतर होने के तरीको को जान पाते हैं।
  इस थेरेपी में मरीज़ के अवांछित बर्ताव पर नियंत्रण पाने की कोशिश की जाती है। मरीज़ इस थेरेपी के माध्यम से कठिन परिस्थितियों का सामना करना सीखता है। इसमें रिलेक्सेशन तकनीक द्वारा मरीज़ को अपना व्यवहार परिस्थिति के मुताबिक बदलना सिखाया जाता है...      

रिलेक्सेशन थेरेपी 

यह थेरेपी मरीज़ को शारीरिक तकलीफों से आराम दिलाने में मददगार साबित होती हैं। इस तकनीक में मरीज़ से व्यायाम कराया जाता है। इन सारी पद्धतियों के साथ ही कुछ दवाएँ भी दी जाती हैं।

दवाईयाँ

हल्के ट्रॉक्यूलाइज़र, एंटीडिप्रेसेंट और कई सारी दवाईयाँ दी जाती हैं जिनसे मरीज़ आराम महसूस कर सकता है। ज़्यादातर उपयोग में आने वाली दवाएँ हैं अल्प्राज़ोलम, डाऐज़ीपाम,क्लोनेज़ीपाम आदि।

शब्दों की शक्ति से सेहत

लोगों का रूझान अब दवाइयाँ गटकने की बजाय शब्दों से हिलिंग करने की ओर जा रहा है। वैसे तो शब्दों की शक्ति से किसी बीमारी को जड़ से मिटा देने की यह थैरेपी नई नहीं है। इसे हम हिप्नोटिज्म या हिप्नोथैरेपी के रूप में जानते हैं। 

यह वह कला है जो दवाई की तुलना में ज्यादा असरदार होती है। वैचारिक असंतुलन या मानसिक रोग में ९० प्रतिशत केसेस ऐसे हैं जिन्हें हिप्नोथैरेपी से ठीक किया जा सकता है। लोगों में असामान्य व्यवहार की वजहें फोबिया, सोशो इकानामिकल फैक्टर, बायोलाजीकल फैक्टर, केमिकल रिजन, मेल नरिशमेंट और जेनेटिक फैक्टर हो सकते हैं।

वैकल्पिक इलाज के रूप में सम्मोहन 

केस हिस्ट्री 
27 वर्षीय इंजीनियर राकेश शर्मा (नाम परिवर्तित) अज्ञात भय का शिकार। काफी इलाज करवाया किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में दोस्त के कहने पर हिप्नोथैरेपिस्ट की शरण ली। टाइम रीग्रेशन थैरेपी से पता चला कि वह पिछले जन्म में किसान था। उसकी पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद उसे उसकी बहू बहुत परेशान करती थी। परेशानी से निजात पाने के लिए अपने ही खेत में फाँसी को गले लगा लिया। अब कोई भय नहीं लगता है। निडरतापूर्वक रहते हैं।

केस हिस्ट्री 
सुनिल मंडलोई (परिवर्तित नाम) बचपन से ही एक सपना दिखाई देता था। चारों तरफ रेत ही रेत है, ऊँट पर कुछ लोग बैठे हैं। कोई मुझे आवाज दे रहा है। मैं चिल्लाता हूँ कि मैं आ रहा हूँ और नींद खुल जाती है। आखिर यह सपना मुझे बार-बार क्यों आता है। 

टाइम रीग्रेशन थैरेपी से ज्ञात हुआ कि पिछले जन्म में बीकानेर के पास एक गाँव गरीबी में दिन गुजार रहे थे। पाकिस्तान से कुछ लोग आते थे और स्मगलिंग के लिए प्रेरित करते थे। लेकिन पत्नी की इच्छा नहीं थी कि वे गलत रास्ते पर जाए। वो नहीं माना और उन लोगों के साथ चल दिया लेकिन रास्ते में साँप के काटने से मृत्यु हो गई। अब सपना आना बंद हो गया है और चैन की नींद सोते हैं।

सिर्फ दो ही केस नहीं रोजाना ऐसे कई केसेस आते हैं जो व्यक्ति विशेष के भूत या भविष्य से जुड़े होते हैं। हिप्नोथैरेपिस्ट डॉ. सिंघ कहते हैं विचार वायरस का काम करते हैं। लोगों में भय समाया हुआ है। 

किसी को नौकरी छूट जाने का भय है तो कोई एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर से परेशान है तो कोई डिप्रेशन का शिकार है तो किसी में लेक ऑफ कॉन्फिडेंस है। ऐसे कई कारण हैं जो मानसिक तनाव को जन्म देते हैं जो कभी-कभी दौरों में बदल जाते हैं और मानसिक रोगों का कारण बनते हैं।

कैसे बनाएँ दूरी इनसे

मेडिटेशन करें 
बायोक्लॉक सेट होना चाहिए यानी निश्चित समय पर सोए 
चरित्र ठीक रखें 
झूठ न बोलें 
संबंधों के प्रति गंभीर रहें 
आहार व विहार सही रखें 
आवेग, आक्रोश को हावी न होने दें।

लोगों का रूझान अब दवाइयाँ गटकने की बजाय शब्दों से हिलिंग करने की ओर जा रहा है। वैसे तो शब्दों की शक्ति से किसी बीमारी को जड़ से मिटा देने की यह थैरेपी नई नहीं है। इसे हम हिप्नोटिज्म या हिप्नोथैरेपी के रूप में जानते हैं। 

यह वह कला है जो दवाई की तुलना में ज्यादा असरदार होती है। वैचारिक असंतुलन या मानसिक रोग में ९० प्रतिशत केसेस ऐसे हैं जिन्हें हिप्नोथैरेपी से ठीक किया जा सकता है। लोगों में असामान्य व्यवहार की वजहें फोबिया, सोशो इकानामिकल फैक्टर, बायोलाजीकल फैक्टर, केमिकल रिजन, मेल नरिशमेंट और जेनेटिक फैक्टर हो सकते हैं।






डर को दूर भगाए सम्मोहन चिकित्सा

मानव प्रकृति है कि वह हर उस चीज से दूर भागना चाहता है, जिससे उसे डर लगता है, जो उसे नापसंद होती है या जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित होती है। अपने अस्तित्व को खतरे में कौन डालना चाहता है?

दुश्चिन्ता का ही एक रूप आतंक अथवा अयथार्थ भय है। भय स्वयंभी चिंता का कारण होता है। साधारण भय और भय रोग (फोबिया) में यह अंतर है। खतरे की स्थिति में जो शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया होती है वह तो सचमुच का भय है। जबकि भय की अनुभूति अथवा काल्पनिक कारणों से भयभीत होना भय रोग कहलाता है। 

अनेक प्रकार के अयथार्थ भय पाए जाते हैं जैसे खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया), ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया), बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया), अँधेरे का भय (निक्टो फोबिया), गंदगी का भय (माइसो फोबिया)।

खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया) :

कभी-कभी कई बार हमें कुछ व्यक्ति यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें खुले स्थान में जाने से डर लगता है। वह व्यक्ति खुले स्थान में अकेले नहीं रह सकता। इस प्रकार का डर ही एगोरा फोबिया कहलाता है। इसमें व्यक्ति बाहर अकेले जाने से या खुले में जाने से डरता है।

ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया) :

इसके अंतर्गत व्यक्ति ऊँचाई पर जाने से डरता है। घबराहट होती है, चक्कर आते हैं, उसे ऐसा लगता है कि वह ऊँचाई पर पहुँचते ही गिर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। कई बार जब यह डर व्यक्ति के गहराई में पहुँच जाता है तो वह बेहोश भी हो जाता है।

बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया) :

कुछ लोगों को बंद स्थान का भय लगता है। बंद स्थान के भय से आशय है उसमें व्यक्ति को लगता है कि अगर वह बंद कमरे में रहता है या रहेगा तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी। वह चाहता है कि वह हर वक्त खुले स्थान में रहे। अगर वह कमरे में भी है तो वह चाहता है कि सारे दरवाजे, खिड़कियाँ खोल दे ताकि अंदर हवा आती रहे। अगर दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो जाएँगे तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी।

मानव प्रकृति है कि वह हर उस चीज से दूर भागना चाहता है, जिससे उसे डर लगता है, जो उसे नापसंद होती है या जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित होती है। अपने अस्तित्व को खतरे में कौन डालना चाहता है?

दुश्चिन्ता का ही एक रूप आतंक अथवा अयथार्थ भय है। भय स्वयंभी चिंता का कारण होता है। साधारण भय और भय रोग (फोबिया) में यह अंतर है। खतरे की स्थिति में जो शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया होती है वह तो सचमुच का भय है। जबकि भय की अनुभूति अथवा काल्पनिक कारणों से भयभीत होना भय रोग कहलाता है। 

अनेक प्रकार के अयथार्थ भय पाए जाते हैं जैसे खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया), ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया), बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया), अँधेरे का भय (निक्टो फोबिया), गंदगी का भय (माइसो फोबिया)।

खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया) :

कभी-कभी कई बार हमें कुछ व्यक्ति यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें खुले स्थान में जाने से डर लगता है। वह व्यक्ति खुले स्थान में अकेले नहीं रह सकता। इस प्रकार का डर ही एगोरा फोबिया कहलाता है। इसमें व्यक्ति बाहर अकेले जाने से या खुले में जाने से डरता है।

ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया) :

इसके अंतर्गत व्यक्ति ऊँचाई पर जाने से डरता है। घबराहट होती है, चक्कर आते हैं, उसे ऐसा लगता है कि वह ऊँचाई पर पहुँचते ही गिर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। कई बार जब यह डर व्यक्ति के गहराई में पहुँच जाता है तो वह बेहोश भी हो जाता है।

बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया) :

कुछ लोगों को बंद स्थान का भय लगता है। बंद स्थान के भय से आशय है उसमें व्यक्ति को लगता है कि अगर वह बंद कमरे में रहता है या रहेगा तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी। वह चाहता है कि वह हर वक्त खुले स्थान में रहे। अगर वह कमरे में भी है तो वह चाहता है कि सारे दरवाजे, खिड़कियाँ खोल दे ताकि अंदर हवा आती रहे। अगर दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो जाएँगे तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी।


सु-जोक चिकित्सा

स्व-उपचार की सरल चिकित्सा


सु-जोक शब्द कोरियन भाषा से संबंधित है। यह दो शब्दों के योग से मिलकर बना है सु+जोक। सु का अर्थ है हाथ तथा जोक का अर्थ है पैर। सु-जोक एक्युप्रेशर स्व-उपचार की एक अत्यन्त सहज एवं सरल चिकित्सा विधि है। 

इसमें हाथों एवं पैरों के निश्चित बिन्दुओं पर दबाव देकर उपचार किया जाता है। मनुष्य के तन तथा मन दोनों की साधारण एवं गंभीर बीमारियों का उपचार सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

कोरिया के चिकित्सक सर पार्क जे.वू. ने इस चिकित्सा पद्धति का अविष्कार दो दशकों के चिंतन के दौरान किया। हाथ एवं पाँव के तलवों में सिर से पाँव तक शरीर के तीन भाग सिर, धड़ तथा पाँव को स्थापित किया गया है।

सिद्धां

एक्युप्रेशर द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में अवरुद्ध चेतना का न केवल संचार होता है, अपितु शरीर के विभिन्न भागों की ऊर्जा के असंतुलन को दूर कर रोगों का निवारण होता है। ऊर्जा चिकित्सा के अंतर्गत रोग की स्थिति ऊर्जा प्रवाह के मार्ग में अवरोध पर निर्भर होती है अथवा शरीर को निश्चित मात्रा में ऊर्जा का न मिलना रोग उत्पन्न करता है।

यह माना गया है कि रोग की अवस्था में मुख्य ऊर्जा मार्ग, जिन्हें हम मेरेडियन भी कहते हैं, में बाधा स्वरूप क्रिस्टल जमा हो जाते हैं। एक्युप्रेशर सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा मार्ग में उत्पन्न अवरोध या क्रिस्टल को दबाव द्वारा तोड़ा या हटाया जाता है। शरीर में 14 मुख्य मेरेडियन, जिन्हें ऊर्जा प्रवाह वाहिकाएं कहा जाता है, होती हैं, जिनमें सात शरीर के अग्र भाग में तथा सात वाहिकाएँ शरीर के पृष्ठ भाग पर स्थापित हैं।

इन्हीं मेरेडियन के माध्यम से शरीर जीवनोपयोगी आवश्यक ऊर्जा ब्रह्मांड से ग्रहण करता है। इस चेतना शक्ति को विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से संबोधित किया गया है। भारत में इसे प्राण, आत्मा, जीव एवं प्राण-शक्ति कहते हैं। पाश्चात्य देशों में इसे यूनिवर्सल लाइफ फोर्स एनर्जी, कॉस्मिक एनर्जी तथा चीन और जापान में 'ची', 'की' एवं शिआत्सु नाम से जाना जाता है।

पंचतत्व सिद्धांत 

हमारा शरीर पंचतत्वों के योग से बना है। इसमें हमारे इस स्थूल भौतिक शरीर में वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश एवं जल रूपी पंचतत्व समाहित हैं। इन्हीं के अनुसार इन तत्वों से संबंधित ऊर्जाओं वायु, अग्नि, पृथ्वी, शुष्कता एवं शीतलता पर शरीर आधारित है। जब तक शरीर में इन पाँच तत्वों की साम्यता है, तब तक शरीर स्वस्थ है। किसी भी एक तत्व के घटने अथवा बढ़ने पर शरीर असहाय हो जाता है, रोगग्रस्त हो जाता है। सु-जोक या अन्य ऊर्जा चिकित्सा में पंचतत्वों में आए बदलाव को पुनः सुधारकर शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है।

इन पाँच तत्वों के आधार पर शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग का अध्ययन किया जाता है। इनको आधार बनाकर शरीर के प्रमुख पाँच अवयव (लीवर, हृदय, तिल्ली, फेफड़े एवं किडनी) आदि वर्गीकृत किए गए हैं। इसके आधार पर संभावित जीवनकाल को विभिन्न आयु वर्गों, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, ऋतुओं, शरीर के तरल पदार्थ, शरीर के मनोभाव व मनोवृत्तियाँ, अवयव, परिवार के सदस्य व रंगादि का पंचतत्व तालिका में समावेश करके निदान का क्षेत्र अत्यंत वृहद् एवं सरल बनाया गया है।

सु-जोक शब्द कोरियन भाषा से संबंधित है। यह दो शब्दों के योग से मिलकर बना है सु+जोक। सु का अर्थ है हाथ तथा जोक का अर्थ है पैर। सु-जोक एक्युप्रेशर स्व-उपचार की एक अत्यन्त सहज एवं सरल चिकित्सा विधि है। 

इसमें हाथों एवं पैरों के निश्चित बिन्दुओं पर दबाव देकर उपचार किया जाता है। मनुष्य के तन तथा मन दोनों की साधारण एवं गंभीर बीमारियों का उपचार सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

कोरिया के चिकित्सक सर पार्क जे.वू. ने इस चिकित्सा पद्धति का अविष्कार दो दशकों के चिंतन के दौरान किया। हाथ एवं पाँव के तलवों में सिर से पाँव तक शरीर के तीन भाग सिर, धड़ तथा पाँव को स्थापित किया गया है।

सिद्धां

एक्युप्रेशर द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में अवरुद्ध चेतना का न केवल संचार होता है, अपितु शरीर के विभिन्न भागों की ऊर्जा के असंतुलन को दूर कर रोगों का निवारण होता है। ऊर्जा चिकित्सा के अंतर्गत रोग की स्थिति ऊर्जा प्रवाह के मार्ग में अवरोध पर निर्भर होती है अथवा शरीर को निश्चित मात्रा में ऊर्जा का न मिलना रोग उत्पन्न करता है।

यह माना गया है कि रोग की अवस्था में मुख्य ऊर्जा मार्ग, जिन्हें हम मेरेडियन भी कहते हैं, में बाधा स्वरूप क्रिस्टल जमा हो जाते हैं। एक्युप्रेशर सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा मार्ग में उत्पन्न अवरोध या क्रिस्टल को दबाव द्वारा तोड़ा या हटाया जाता है। शरीर में 14 मुख्य मेरेडियन, जिन्हें ऊर्जा प्रवाह वाहिकाएं कहा जाता है, होती हैं, जिनमें सात शरीर के अग्र भाग में तथा सात वाहिकाएँ शरीर के पृष्ठ भाग पर स्थापित हैं।

इन्हीं मेरेडियन के माध्यम से शरीर जीवनोपयोगी आवश्यक ऊर्जा ब्रह्मांड से ग्रहण करता है। इस चेतना शक्ति को विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों से संबोधित किया गया है। भारत में इसे प्राण, आत्मा, जीव एवं प्राण-शक्ति कहते हैं। पाश्चात्य देशों में इसे यूनिवर्सल लाइफ फोर्स एनर्जी, कॉस्मिक एनर्जी तथा चीन और जापान में 'ची', 'की' एवं शिआत्सु नाम से जाना जाता है।

पंचतत्व सिद्धांत 

हमारा शरीर पंचतत्वों के योग से बना है। इसमें हमारे इस स्थूल भौतिक शरीर में वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश एवं जल रूपी पंचतत्व समाहित हैं। इन्हीं के अनुसार इन तत्वों से संबंधित ऊर्जाओं वायु, अग्नि, पृथ्वी, शुष्कता एवं शीतलता पर शरीर आधारित है। जब तक शरीर में इन पाँच तत्वों की साम्यता है, तब तक शरीर स्वस्थ है। किसी भी एक तत्व के घटने अथवा बढ़ने पर शरीर असहाय हो जाता है, रोगग्रस्त हो जाता है। सु-जोक या अन्य ऊर्जा चिकित्सा में पंचतत्वों में आए बदलाव को पुनः सुधारकर शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है।

इन पाँच तत्वों के आधार पर शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग का अध्ययन किया जाता है। इनको आधार बनाकर शरीर के प्रमुख पाँच अवयव (लीवर, हृदय, तिल्ली, फेफड़े एवं किडनी) आदि वर्गीकृत किए गए हैं। इसके आधार पर संभावित जीवनकाल को विभिन्न आयु वर्गों, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, ऋतुओं, शरीर के तरल पदार्थ, शरीर के मनोभाव व मनोवृत्तियाँ, अवयव, परिवार के सदस्य व रंगादि का पंचतत्व तालिका में समावेश करके निदान का क्षेत्र अत्यंत वृहद् एवं सरल बनाया गया है।

सु-जोक चिकित्सा : उपचार पद्धति

उपचार के दौरान प्रतिक्रियाएँ


उपचार के दौरान निम्न प्रतिक्रियाएँ रोगी में परिलक्षित हो सकती हैं-

1. उपचार के बाद शरीर सहज होने के कारण रोगी निंदालु हो जाते हैं, अथक नींद बढ़ जाती है।

2. हाथों द्वारा उत्सर्जी पदार्थों का निष्कर्षन।

3. उपचार के दौरान स्त्रियों में योनि में सफेद स्राव होने लग सकता है।

4. रोगी अपने उत्सर्जी पदार्थों को त्वचा के माध्यम से शरीर के बाहर फेंकता है, परिणामस्वरूप शरीर पर छोटे-छोटे दाने, फफोले या अन्य चर्म रोग संबंधी अपद्रव हो सकते हैं।

5. उपचार के दौरान रोगी को बुखार आ सकता है एवं पूर्व के संक्रमण पुनः उभर के आ सकते हैं।

6. उपचार के दौरान रोगी शांत एवं गहरी निद्रा में सो जाता है।



7. उपचार से अवरुद्ध विकार बाहर निकलने का प्रयास करते हैं, फलस्वरूप पेशाब की मात्रा में वृद्धि हो जाती है।

8. छींकें आना प्रारंभ हो सकती हैं। अतः उपचार के दौरान किसी भी प्रकार के प्रतिकूल या अनुकूल लक्षण दिखाई दें तो घबराना नहीं चाहिए। निरन्तर उपचार प्रारंभ रखें।

शरीर में मनोभावों का संग्रह


रेकी से समझे अंगो को
जैसा मन वैसा तन अर्थात शरीर और मन की स्वच्छता एक-दूसरे पर आधारित है। जैसे हमारे मन के विचार व भावनाएँ होंगी उसी के अनुरूप हमारे शरीर का गठबंधन होता है। सकारात्मक विचार व भावनाएँ हमारे शरीर को नरम व स्वस्थ बनाकर आकर्षण प्रदान करते हैं, जबकि नकारात्मक विचार व भावनाएँ हमारे शरीर को संकुचित करके कठोरता प्रदान करते हैं। जीवन में नकारात्मकता के कारण ही हम अस्वस्थ व कुरूप बने रहते हैं।



व्यक्ति के शरीर का प्रत्येक अंग विभिन्न प्रकार के विचारों व भावनाओं को प्रदर्शित करता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का आसानी से पता चल जाता है। व्यक्ति अपने शरीर में कहाँ-कहाँ विचारों व भावनाओं का संग्रह करता है इसकी थोड़ी-सी जानकारी यहाँ पर दी जा रही है। शरीर विज्ञान के इन रहस्यों को जानकर व्यक्ति चिंतन-मनन द्वारा या किसी साधना द्वारा सकारात्मक यानी पॉजिटिव विचारों को स्थिर करके नकारात्मक यानी नेगेटिव विचारों से मुक्ति पाकर स्वस्थ, शांत व आनंदित रह सकता है।

शरीर का अगला हिस्सा- शरीर के अगले हिस्से द्वारा क्रोध, जाग्रति, आभार, दुःख, प्रेम, धिक्कार, आनंद, ईर्ष्या और द्वेष कामनाओं के सर्जन-विसर्जन, चेतना व स्फूर्ति या जड़ता और सुस्ती के भावों का प्रतिबिंब पड़ता है।

शरीर का पिछला हिस्सा- हम जो प्रश्न या समस्याएँ छिपाना चाहते हैं और उन्हें सुलझाना नहीं चाहते या टाल देते हैं, उन सभी का यहाँ पर संग्रह होता है। जिन्हें हम पसंद नहीं करते, ऐसे भी मनोभावों को मुक्त करने का यह केन्द्र स्थान माना गया है। हमारी अचेतन अवस्था की भावनाओं व विचारों की अधिक मात्रा का यहाँ पर समावेश होता है।

नाक- गंध-सुगंध की पहचान करने वाले भावों को दर्शाती है। हृदय के साथ सीधा संबंध है। यहाँ पर स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबंधों का प्रत्याघात मिलता है।

मुँह- जीवन के पोषक तत्वों का रक्षण करता है। अतः जीवन से संबंधित नए प्रसंगों के विचारों को ग्रहण करने या न करने के भावों को दर्शाता है।

मस्तक- व्यक्ति के बुद्धिमान व तेजस्वी होने या न होने के भावों को दर्शाता है।

गर्दन- यहाँ पर विचारों व भावनाओं का प्रवाह आता है, जिसे दबाने से गर्दन अकड़ जाती है।

चेहरा- हमारे व्यक्तित्व के भाव प्रदर्शित होते हैं, हम जगत का मुकाबला कैसे करते हैं?



आँखें- हमारी आत्मा की खिड़की। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि- जितनी दृष्टि उतनी सृष्टि का भाव प्रदर्शित होता है। नजर के पास वाले पदार्थों व जीवों के प्रति अधिक ममता की नजर से दूर वाले पदार्थ व जीवों के प्रति कम ममता का भाव प्रदर्शित होता है।

कान- शरीर के प्रत्येक हिस्से के एक्युप्रेशर के केन्द्र यहाँ पर हैं। सुनने की क्षमता के भावों को प्रदर्शित करता है।

जबड़े- विचारों व भावनाओं को रोंदने पर यह अंग खिंचाव का अनुभव करता है। डर व सुरक्षा के भावों को दर्शाता है।

हाथ की कलाइयाँ- ये अंग हृदय चक्र का क्षेत्र होने के कारण प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

छाती- यहाँ पर जीवन के तत्व हैं। श्वासोश्वास के साथ संबंध है, हृदय का केन्द्र है। अन्य व्यक्ति के संबंधों को दर्शाता है।

पेट- पाचन शक्ति का केन्द्र। जातीयता का केन्द्र। भावनाओं की यहाँ पर बैठक है व गहरी भावनाओं का यहाँ पर संग्रह होता है।

गुप्तांग, जनन अवयव- यहाँ पर जीवन के तत्व स्थित है, जीवन के अस्तित्व का भय यहाँ बना रहता है।



घुटने- शारीरिक परिवर्तन का भय, बूढ़े होने का भय, स्वाभिमान में कमी होने का भय व मृत्यु के भय के कारण यहाँ पर तकलीफ होती है।

पैर- अपनी ध्येय-प्राप्ति न होने व अस्थिरता के भावों के कारण यहाँ तकलीफ होती है।

कन्धा- संतुलन बनाए रखने का भाव, जवाबदारी का भाव, जगत का भार रहने के भाव व्यक्त होते हैं। स्त्रियाँ यहाँ पर अधिक संग्रह करती हैं।

किसी भी प्रकार की साधना द्वारा, व्यायाम द्वारा, रेकी अभ्यास द्वारा, हलन-चलन द्वारा या तीव्र गति से पैदल चलने से शरीर के अंदर संग्रहित मनोभावों के तनावों से मुक्ति प्राप्त करके स्वयं को स्वस्थ व आकर्षक बनाया जा सकता है।

रोग का समूल उपचार रेकी से

रेकी का इतिहा
हमारा देश आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न देश है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके प्रमाण पाए गए हैं, किंतु गुरु-शिष्य परंपरा के कारण यह विद्या मौखिक रूप से ही रही। लिखित में यह विद्या न होने से धीरे-धीरे इस विद्या का लोप होता चला गया। 

2500 वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।

19वीं शताब्दी में जापान के डॉ. मिकाओ उसुई ने इस विद्या की पुनः खोज की और आज यह विद्या रेकी के रूप में पूरे विश्र्व में फैल गई है। डॉ. मिकाओ उसुई की इस चमत्कारिक खोज ने 'स्पर्श चिकित्सा' के रूप में संपूर्ण विश्व को चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान की है।

रेकी सीखने के ला

1. यह शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक स्तरों को प्रभावित करती है।

2. शरीर की अवरुद्ध ऊर्जा को सुचारुता प्रदान करती है।

3. शरीर में व्याप्त नकारात्मक प्रवाह को दूर करती है।

4. अतीद्रिंय मानसिक शक्तियों को बढ़ाती है।

5. शरीर की रोगों से लड़ने वाली शक्ति को प्रभावी बनाती है।

6. ध्यान लगाने के लिए सहायक होती है।

7. समक्ष एवं परोक्ष उपचार करती है।

8. सजीव एवं निर्जीव सभी का उपचार करती है।

9. रोग का समूल उपचार करती है।

10. पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती है।

रेकी की आभार विधि

स्वयं को दैनिक रेकी दें। यह अपनी बैटरी चार्ज करने की तरह है। सदैव स्वयं को पूरे शरीर पर रेकी दें। प्रत्येक केंद्र पर तीन से पाँच मिनट तक रेकी मिलना चाहिए। इसके बाद रोगग्रस्त भाग पर दस से बीस मिनट तक आवश्यकतानुसार रेकी दें। बूढ़ों तथा बच्चों के लिए सामान्यतः बीस से तीस मिनट की चिकित्सा पर्याप्त होती है। रेकी कपड़ों, कंबल, पट्टी, प्लास्टर इत्यादि में से गुजर जाती है। उपचारी का उपचार करते समय हमेशा अपनी तथा रोगी की स्थिति सुविधापूर्ण रखें।

रेकी करने से पूर्व उपयोगी सुझाव 

* अपनी तथा रोगी की घड़ी, बेल्ट, टाई तथा आभूषण उतार दें।

* ढीले तथा आरामदायक वस्त्र पहनें।

* रेकी देते समय हमेशा अपनी हथेलियों को ओक बनाकर रखें।

* यह आवश्यक नहीं है कि उपचारक के साथ सदैव गर्म हों।

* रेकी को ध्यान, योग इत्यादि के साथ-साथ किया जा सकता है।

* रेकी का उपयोग शल्य चिकित्सा के पूर्व तथा बाद में अच्छा रहता है।

प्रभामंडल उपचार 

हथेलियों को शरीर से एक से चार इंच की ऊँचाई पर रखते हुए विभिन्न केंद्रों पर शरीर का उपचार किया जा सकता है। इस प्रकार रेकी का प्रयोग कर शरीर में होने वाली बीमारियों को समय से पहले रोका जा सकता है।

आभार विधि 

* मैं अपना आभार मानता हूँ।

* मैं ईश्वर का आभार मानता हूँ।

* मैं अपने माता-पिता का आभार मानता हूँ।

* मैं अपने गुरु का आभार मानता हूँ।

* मैं रेकी ऊर्जा, रेकी गाइड्स, रेकी ग्रैंड मास्टर डॉ. मिकाओ उसुई, 
डॉ. हयाशी, मैडम टकाटा का आभार मानता हूँ।

* यदि किसी दूसरे व्यक्ति को रेकी दें तो उस व्यक्ति का आभार मानें।

रेकी का महत्त्व एवं उपयोग

रेकी कैसे सीखी जाती है?


रेकी बहुत सौम्य ऊर्जा होने के साथ-साथ बहुत प्रभावी होती है। इसके उपयोग के लंबे इतिहास में यह हृदय रोग, कैंसर, अस्थि भंग, अनिद्रा, थकान, सिरदर्द, चर्म रोग, डिप्रेशन इत्यादि में प्रभावी सिद्ध हुई है। यदि उपचार की अन्य विधियों के साथ में इसका उपयोग किया जाता है तो यह उनके प्रभावों को बढ़ाती है व रोगी अपेक्षाकृत कम समय में ठीक हो सकता है।

रेकी का मूल्य 

1. इससे नुकसान कुछ नहीं होता, परन्तु यह फायदा बहुत करती है।

2. यह एक क्षण में उत्पन्न होती है और इसकी स्मृति सदा के लिए बनी रहती है।

3. कोई मनुष्य इनता धनी नहीं है कि जिसका इसके सिवाय निर्वाह हो सके, और न कोई इतना दरिद्र है कि जो इसके लाभों से धनी न हो सके ।

4. यह विचारों में शुद्धता व विश्वास लाती है, परिवार में सुख व हौसला बढ़ाती है, व्यापार में हिम्मत व ख्याति प्रदान करती है, व्यवहार में कुशलता व समर्थन पैदा करती है।

5. यह थके हुए व्यक्ति के लिए विश्राम है, हतोत्साह के लिए दिन का प्रकाश है, ठिठुरे हुए के लिए धूप है, कष्ट के लिए प्रकृति का सर्वोत्तम प्रतिकार है। स्वास्थ्य के लिए कायाकल्प का वरदान है।

6. जब तक यह न ली जाए तब तक संसार में यह किसी के काम की नहीं।

रेकी कैसे सीखी जाती है? 

रेकी की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी सरल चिकित्सा। इसलिए कोई भी व्यक्ति इसे सीख सकता है। इसमें उम्र, शिक्षा, साधना, आसन आदि का कोई बंधन नहीं है। इसे सीखने के लिए केवल इच्छा, विश्वास एवं श्रद्धा की आवश्यकता है।

यह विद्या दो दिन के सेमिनार में सिखाई जाती है, जिसमें करीब बारह से पंद्रह घंटे का समय लगता है। इस सेमिनार में 'रेकी मास्टर' (प्रशिक्षक) द्वारा व्यक्ति को 'सुसंगतता' प्रदान की जाती है, जिसे 'एट्यूनमेंट' या 'इनिसियेशन' या 'शक्तिपात' भी कहा जाता है, जिससे व्यक्ति के शरीर में स्थित 'शक्ति केंद्र' जिन्हें हम 'चक्र' कहते है, खुलकर गतिमान हो जाते हैं, जिससे उनमें 'जीनव शक्ति' का संचार होने लगता है।

इसके बाद यह शक्ति जीवनपर्यंत तथा हर समय व्यक्ति के पास रहती है। इससे वह स्वयं का और दूसरों का उपचार कर सकता है। इस शक्ति को और अधिक विकसित कर समय एवं दूरी से ऊपर उठकर उचार करने की शक्ति प्राप्त होती है।

रेकी की सुचारुता 

चूँकि रेकी का प्रयोग करने वाला व्यक्ति केवल उसका वाहक होता है, उसका मूल स्रोत नहीं, अतः प्रयोग करने के कारण रेकी उपचारक की अपनी ऊर्जा कम नहीं होती, अपितु उसके माध्यम से रेकी जाने के कारण रोगी की चिकित्सा के साथ-साथ उसकी अपनी भी चिकित्सा होती है और उपचारक का ऊर्जा स्तर बढ़ता है।

स्मरण शक्ति हेतु पिरामिड कैप

पिरामिड कैप से अन्य लाभ


1. प्रत्येक विद्यार्थी को अपना अलग-अलग पिरामिड (मस्तक पर रखने के लिए) रखना चाहिए।

2. अपने पिरामिड का उपयोग दूसरे व्यक्ति को करने से रोकिए।

3. पढ़ाई हेतु प्रतिदिन एक ही जगह पर बैठना चाहिए। प्रतिदिन पढ़ाई स्थल बदलनाठीक नहीं है। चित्त की एकाग्रता खंडित, क्षीण होती है।

4. अपना मुख उत्तर दिशा की ओर रखिए तथा मस्तक पर धारण किए हुए पिरामिड की एक बाजू भी उत्तर दिशा की ओर ही रखिए।

5. पढ़ाई के लिए प्रतिदिन एक निश्चित समय निर्धारित कीजिए। एक दिन सुबह तथा अन्य दिन शाम को इस प्रकार परिवर्तन नहीं करना चाहिए।

6. पिरामिड को रेडियो, टीवी तथा भारी विद्युत वाहक तारों से 10 फीट की दूरी पर रखें, क्योंकि ये वस्तुएँ पिरामिड शक्ति की उत्पत्ति में अवरोधक हैं। फलतः अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाता है।

* पिरामिड कैप के प्रयोग से लाभ 

1. इसके प्रयोग से एकाग्रता में वृद्धि होती है एवं इसका उपयोग मानसिक, शारीरिक शांति प्रदान करता है।

2. सामान्यतः अध्ययन करते समय घंटे-डेढ़ घंटे बाद शरीर के जोड़ों में दर्द का अनुभव होता है, किन्तु पिरामिड कैप का प्रयोग करते समय दर्द का कोई अनुभव नहीं होता एवं शरीर तथा मन हलके प्रतीत होते हैं।

3. पिरामिड केप के साथ में पिरामिड पॉवरमेट अथवा पिरामिड यंत्र के ऊपर बैठने से अधिक पिरामिड शक्ति प्राप्त होगी एवं आठ-दस दिन के उपयोग के बाद आपको विश्वास हो जाएगा कि साधारण प्रकार के आसन पर बैठकर किए जाने वाले अध्ययन/ध्यान की तुलना में पिरामिडयुक्त आसन पर बैठकर किया गया अध्ययन गहरा व घनिष्ठ होता है।

4. इसके मानसिक विकास, तर्क शक्ति में वृद्धि, शरीर हलका एवं अधिक स्फूर्तिमय बनता है।

5. सिर दर्द, शरीर में पीड़ा हो, सुस्तता आ जाए तब 45 मिनट पिरामिड का प्रयोग करने पर पीड़ा का शमन होता है एवं ताजगी का अनुभव होता है।

6. मंद बुद्धि वाले व मानसिक रूप से पिछड़े व अर्द्ध पागल व्यक्तियों को बड़े पिरामिड में रखें तो बीमारी में शीघ्र सुधार होता है।

* पिरामिड से स्लोप को सही करना संभव है। 

अगर आपका ईशान ऊँचा है और नेऋत्य नीचा है तो आप इसे बिना तोड़े-फोड़े सही कर सकते हैं। इसके लिए आपको नेऋत्य में नौ पिरामिड वाले 6 यंत्र लगाने पड़ेंगे और ईशान में उससे कम 2 लगाने पड़ेंगे, जिससे आप इस दोष से कुछ हद तक छुटकारा पा सकते हैं।

* पढ़ाई हेतु पिरामिड 

इस प्रकार हम पिरामिड का पूरा घर बनाकर रह सकते हैं, जिससे हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। हम यदि पिरामिड के बने घर में पढ़ाई करेंगे तो हमारी पढ़ाई बहुत ही अच्छी होगी एवं रोज नियमित समय तक पढ़ेंगे तो परीक्षा में अच्छे नंबर जरूर आएँगे।

* अनिद्रा व पिरामिड 

आज के व्यस्त एवं तनावग्रस्त जीवन में व्यक्तियों को मानसिक तनाव, अशांति के कारण अनिद्रा की तकलीफ होती है। पिरामिड कैप को सोते समय अपने मुँह पर रखकर उसके शिखर के अंदर ध्यान केन्द्रित करने से शीघ्र नींद आ जाती है।

वास्तु दोष होने पर पिरामिड यंत्र के द्वारा वास्तु दोष का निवारण कर सकते हैं। अतः अनुभवी वास्तुशास्त्री की सलाह से पिरामिड यंत्र स्थापित करवाकर वास्तु दोष का निवारण कर सुख-शांति का अनुभव कर सकते हैं।

* अन्य तरीके एवं लाभ 

1. पिरामिड कैप का नियमित उपयोग कम उम्र में असमय बालों को सफेद होने से रोकता है।

2. पूजा ध्यान करते समय पिरामिड केप का उपयोग करने से एकाग्रता में वृद्धि होती है व मन को शांति मिलती है।

3. दाढ़ी के लिए हम नया ब्लेड इस्तेमाल करते हैं और वह दो या तीन दिन के बाद खत्म हो जाता है, परन्तु पिरामिड के नीचे एक तिहाई ऊँचाई पर 6-7 दिन रखने से उसकी धार 50 प्रतिशत तक पुनः तेज हो जाती है।

पिरामिड ‍चिकित्सा : एक परिचय

ज्ञात एवं अज्ञात शक्तियों का मिलन


ग्रीक भाषा में पायर शब्द का अर्थ है 'अग्नि'। पिरामिड का अर्थ है, जिसके मध्य में अग्नि है वह वस्तु। अग्नि एक प्रकार की ऊर्जा है। अतः 'पिरामिड' का सही अर्थ हुआ 'जिसके मध्य में अग्निमय ऊर्जा बहती रहती है ऐसा साधन।' यह अग्नि ऊष्ण नहीं होती ऐसी अग्नि-ऊर्जा, शांति प्रदान कर सकती है, विकारों को रोक सकती है तथा विकारों से सुरक्षित भी रख सकती है।

संशोधक-लेखक मेनली पामर हॉल ने अपनी पुस्तक 'द सीक्रेट टीचिंग ऑफ ऑल एजीज' में कहा है- 'ये भव्य पिरामिड विश्व के शाश्वत्‌ ज्ञान का जीवंत संयोजन हैं। इसके कोने शांति, गहनता, बुद्धिमत्ता तथा सच्चाई के प्रतीक हैं। इनके तिकोनिया भाग त्रिस्तरीय आत्मिक शक्ति के प्रतीक हैं। पिरामिड का दक्षिणी हिस्सा ठंडक का, उत्तरी हिस्सा गर्मी का, पश्चिमी हिस्सा अंधकार का और पूर्व का हिस्सा प्रकाश का प्रतीक है।'

यदि इस तथ्य को स्वीकार कर लिया जाए तो स्पष्ट है कि पिरामिड का निर्माण उच्च स्तर की प्राप्ति हेतु तथा शरीर में, पदार्थ में अंतर्निहित ऊर्जा को जाग्रत करने हेतु ही हुआ है। इसी कारण कई अनुभवों से सिद्ध हुआ है कि पिरामिड के भीतर बैठने से शांति का अनुभव होता है तथा उसके कारण मानसिक शक्ति में वृद्धि की जा सकती है।

सबसे बड़े पिरामिड तथा उसके आसपास रखे गए छोटे-छोटे पिरामिडों के परिसर में ब्रह्मांड की ऊर्जा का क्षेत्र स्थित है। इस परिसर में उत्पन्न प्रवाह विशेष, इलेक्ट्रो-मेग्नेटिक प्रति ऊर्जा को उद्भवित करता है तथा ऊर्जा को वहन करता है। इस संबंध में डॉ. फ्लेनगन लिखते हैं- 'पिरामिड विशेष भौमितिक आकार के फलस्वरूप उसके पाँचों कोनों (चार बाजू के तथा एक शिखर को) में एक विशिष्ट प्रकार का सूक्ष्म किरणोत्सर्ग उत्पन्न होता है।

यह ऊर्जा पिरामिड की एक-तिहाई ऊँचाई पर स्थित 'किंग्स चेम्बर' नामक विस्तार में घनीभूत होती है। जिस बिन्दु पर यह ऊर्जा केन्द्रित होती है, उस बिन्दु को 'फोकल जाइट' कहते हैं। इस बिन्दु पर स्थित अणु इस ऊर्जा को अवशोषित करते हैं, जिसके फलस्वरूप अणु के अंतर्गत छिपे परमाणु स्पन्दित होते हैं और परमाणु की भ्रमण कक्षा में स्थित इलेक्ट्रॉन अपनी भ्रमण कक्षा (वर्तुल) को छोड़कर बाहर निकल जाते हैं। 


इसके कारण प्रचंड ऊर्जा (ऐटमिक-ऐनर्जी) उत्पन्न होती है। ऐसी प्रचंड ऊर्जा पिरामिड के पाँचों कोनों में से बाहर फैलती है और पिरामिड के आसपास का क्षेत्र एवं वातावरण आवेशित हो जाता है। इस प्रकार उत्पन्न ऊर्जा को मानव जाति के लाभार्थ एवं विकासार्थ प्रयोजित करने के उपायों के संबंध में आधुनिक विज्ञानी खोज कर रहे हैं।


  इनके तिकोनिया भाग त्रिस्तरीय आत्मिक शक्ति के प्रतीक हैं। पिरामिड का दक्षिणी हिस्सा ठंडक का, उत्तरी हिस्सा गर्मी का, पश्चिमी हिस्सा अंधकार का और पूर्व का हिस्सा प्रकाश का प्रतीक है।'      
पिरामिड का स्मरण होते ही याद आ जाती है 'ममी' की। अर्थात्‌ हजारों सालों से पिरामिड में सुरक्षित मृत देहों की। इजिप्ट के पिरामिडों की चमत्कारिक शक्ति का एकमात्र कारण उसकी विशिष्ट भौमितिक आकृति तथा उसकी संरचना है। मंदिर की आकृति, मस्जिद के गुम्बजों, चर्च के मीनारों की टोच, बौद्ध धर्म के पेगोडा के आकार, इसी संरचना पर आधारित हैं। इन स्थलों में बैठने से हमें जिस शांति का अनुभव होता है, उसका कारण यह है कि वहाँ कोई शक्ति विशेष प्रवाहित हो रही है। शक्ति विशेष के इस प्रवाह का कारण इन रचनाओं के ऊपरी हिस्से की विशिष्ट आकृतियाँ हैं।

पिरामिड के एक बाजू को बराबर चुम्बकीय उत्तर दिशा में रखा जाए तो वातावरण में स्थित ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ पिरामिड के शिखर के रास्ते अंदर प्रवेश करती हैं और ये अंदर ही अंदर बिलोती रहती हैं, तत्पश्चात्‌ बाहर निकलती हैं। एक इंच की ऊँचाई वाले पिरामिड का प्रभाव आठ इंच तक रहता है। वैज्ञानिकों ने निरीक्षण किया है कि एक इंच की ऊँचाई वाले छोटे पिरामिड का प्रभाव आठ इंच की ऊँचाई तक रहता है। मतलब पिरामिड के भीतरी भाग में तो शक्ति है ही, इसके अतिरिक्त उसके आसपास, ऊपर-नीचे वाले हिस्से में भी शक्ति का अस्तित्व रहता है।

ग्रीक भाषा में पायर शब्द का अर्थ है 'अग्नि'। पिरामिड का अर्थ है, जिसके मध्य में अग्नि है वह वस्तु। अग्नि एक प्रकार की ऊर्जा है। अतः 'पिरामिड' का सही अर्थ हुआ 'जिसके मध्य में अग्निमय ऊर्जा बहती रहती है ऐसा साधन।' यह अग्नि ऊष्ण नहीं होती ऐसी अग्नि-ऊर्जा, शांति प्रदान कर सकती है, विकारों को रोक सकती है तथा विकारों से सुरक्षित भी रख सकती है।

संशोधक-लेखक मेनली पामर हॉल ने अपनी पुस्तक 'द सीक्रेट टीचिंग ऑफ ऑल एजीज' में कहा है- 'ये भव्य पिरामिड विश्व के शाश्वत्‌ ज्ञान का जीवंत संयोजन हैं। इसके कोने शांति, गहनता, बुद्धिमत्ता तथा सच्चाई के प्रतीक हैं। इनके तिकोनिया भाग त्रिस्तरीय आत्मिक शक्ति के प्रतीक हैं। पिरामिड का दक्षिणी हिस्सा ठंडक का, उत्तरी हिस्सा गर्मी का, पश्चिमी हिस्सा अंधकार का और पूर्व का हिस्सा प्रकाश का प्रतीक है।'

यदि इस तथ्य को स्वीकार कर लिया जाए तो स्पष्ट है कि पिरामिड का निर्माण उच्च स्तर की प्राप्ति हेतु तथा शरीर में, पदार्थ में अंतर्निहित ऊर्जा को जाग्रत करने हेतु ही हुआ है। इसी कारण कई अनुभवों से सिद्ध हुआ है कि पिरामिड के भीतर बैठने से शांति का अनुभव होता है तथा उसके कारण मानसिक शक्ति में वृद्धि की जा सकती है।

सबसे बड़े पिरामिड तथा उसके आसपास रखे गए छोटे-छोटे पिरामिडों के परिसर में ब्रह्मांड की ऊर्जा का क्षेत्र स्थित है। इस परिसर में उत्पन्न प्रवाह विशेष, इलेक्ट्रो-मेग्नेटिक प्रति ऊर्जा को उद्भवित करता है तथा ऊर्जा को वहन करता है। इस संबंध में डॉ. फ्लेनगन लिखते हैं- 'पिरामिड विशेष भौमितिक आकार के फलस्वरूप उसके पाँचों कोनों (चार बाजू के तथा एक शिखर को) में एक विशिष्ट प्रकार का सूक्ष्म किरणोत्सर्ग उत्पन्न होता है।

यह ऊर्जा पिरामिड की एक-तिहाई ऊँचाई पर स्थित 'किंग्स चेम्बर' नामक विस्तार में घनीभूत होती है। जिस बिन्दु पर यह ऊर्जा केन्द्रित होती है, उस बिन्दु को 'फोकल जाइट' कहते हैं। इस बिन्दु पर स्थित अणु इस ऊर्जा को अवशोषित करते हैं, जिसके फलस्वरूप अणु के अंतर्गत छिपे परमाणु स्पन्दित होते हैं और परमाणु की भ्रमण कक्षा में स्थित इलेक्ट्रॉन अपनी भ्रमण कक्षा (वर्तुल) को छोड़कर बाहर निकल जाते हैं। 


इसके कारण प्रचंड ऊर्जा (ऐटमिक-ऐनर्जी) उत्पन्न होती है। ऐसी प्रचंड ऊर्जा पिरामिड के पाँचों कोनों में से बाहर फैलती है और पिरामिड के आसपास का क्षेत्र एवं वातावरण आवेशित हो जाता है। इस प्रकार उत्पन्न ऊर्जा को मानव जाति के लाभार्थ एवं विकासार्थ प्रयोजित करने के उपायों के संबंध में आधुनिक विज्ञानी खोज कर रहे हैं।


  इनके तिकोनिया भाग त्रिस्तरीय आत्मिक शक्ति के प्रतीक हैं। पिरामिड का दक्षिणी हिस्सा ठंडक का, उत्तरी हिस्सा गर्मी का, पश्चिमी हिस्सा अंधकार का और पूर्व का हिस्सा प्रकाश का प्रतीक है।'      
पिरामिड का स्मरण होते ही याद आ जाती है 'ममी' की। अर्थात्‌ हजारों सालों से पिरामिड में सुरक्षित मृत देहों की। इजिप्ट के पिरामिडों की चमत्कारिक शक्ति का एकमात्र कारण उसकी विशिष्ट भौमितिक आकृति तथा उसकी संरचना है। मंदिर की आकृति, मस्जिद के गुम्बजों, चर्च के मीनारों की टोच, बौद्ध धर्म के पेगोडा के आकार, इसी संरचना पर आधारित हैं। इन स्थलों में बैठने से हमें जिस शांति का अनुभव होता है, उसका कारण यह है कि वहाँ कोई शक्ति विशेष प्रवाहित हो रही है। शक्ति विशेष के इस प्रवाह का कारण इन रचनाओं के ऊपरी हिस्से की विशिष्ट आकृतियाँ हैं।


पिरामिड के एक बाजू को बराबर चुम्बकीय उत्तर दिशा में रखा जाए तो वातावरण में स्थित ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ पिरामिड के शिखर के रास्ते अंदर प्रवेश करती हैं और ये अंदर ही अंदर बिलोती रहती हैं, तत्पश्चात्‌ बाहर निकलती हैं। एक इंच की ऊँचाई वाले पिरामिड का प्रभाव आठ इंच तक रहता है। वैज्ञानिकों ने निरीक्षण किया है कि एक इंच की ऊँचाई वाले छोटे पिरामिड का प्रभाव आठ इंच की ऊँचाई तक रहता है। मतलब पिरामिड के भीतरी भाग में तो शक्ति है ही, इसके अतिरिक्त उसके आसपास, ऊपर-नीचे वाले हिस्से में भी शक्ति का अस्तित्व रहता है।

चुम्बक चिकित्सा की पद्धति


प्रमुखतया चुम्बक चिकित्सा की दो पद्धतियाँ प्रचलित हैं- 1. सार्वदैहिक अर्थात हथेलियों व तलवों पर लगाने से तथा 2. स्थानिक अर्थात्‌ रोगग्रस्त भाग पर लगाने से। इनका वर्णन यहाँ दिया जा रहा है -

Chumbak chikitsa


1. सार्वदैहिक प्रयोग 

इस प्रयोग विधि के अनुसार उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रव से सम्पन्न चुम्बकों का एक जोड़ा लिया जाता है। शरीर के विद्युतीय सहसंबंध के आधार पर सामान्यतया उत्तरी ध्रुव वाले चुम्बक का प्रयोग शरीर के दाएँ भागों पर, आगे की ओर व उत्तरी भागों पर किया जाता है, जबकि दक्षिणी ध्रुव वाले चुम्बक का प्रयोग शरीर के बाएँ भागों पर, पीठ पर तथा निचले भागों पर किया जाता है।

यह अटल नियम चुम्बकों के सार्वदैहिक प्रयोग पर ही लागू होता है, जबकि स्थानिक प्रयोग की अवस्था में रोग संक्रमण, दर्द, सूजन आदि पर अधिक ध्यान दिया जाता है। उत्तम परिणाम हासिल करने के लिए जब रोग अथवा उसका प्रसार शरीर के ऊपरी भाग अर्थात्‌ नाभि से ऊपर हो तो चुम्बकों को हथेलियों पर लगाया जाता है, जबकि शरीर के निचले भागों अर्थात्‌ नाभि से नीचे विद्यमान रोगों में चुम्बकों को तलवों में लगाया जाता है।

2. स्थानिक प्रयो

इस प्रयोग विधि में चुम्बकों को उन स्थानों पर लगाया जाता है, जो रोगग्रस्त होते हैं, जैसे- घुटना और पैर, दर्दनाक कशेरुका, आँख, नाक आदि। इनमें रोग की तीव्रता तथा रूप के अनुसार एक, दो और यहाँ तक कि तीन चुम्बकों का प्रयोग भी किया जा सकता है। 

उदाहरणार्थ- घुटने तथा गर्दन के तेज दर्द में दो चुम्बकों को अलग-अलग घुटनों पर तथा तीसरे चुम्बक को गर्दन की दर्दनाक कशेरुका पर लगाया जा सकता है। इस प्रयोग विधि की उपयोगिता स्थानिक रोग संक्रमण की अवस्था में भी होती है। अँगूठे में तेज दर्द होने जैसी कुछ अवस्थाओं में कभी-कभी दोनों चुम्बकों के ध्रुवों के बीच अँगूठा रखने से तुरंत आराम मिलता है।

चुम्बक प्रयोग में सावधानियाँ

चुम्बक प्रयोग की अवधि
कोशिकाओं पर चुम्बकों के प्रभाव का ज्ञान तथा अनुभव बताता है कि सावधानीपूर्वक किए गए उपयोग से शरीर पर इसका बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। फिर भी किसी अनपेक्षित प्रभाव से मुक्त रहने के लिए इन निम्नलिखित सावधानियों का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना चाहिए।

Chumbak chikitsa


चुम्बकों का चयन

चुम्बक का आकार और डिजाइन इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे शरीर के किस भाग पर लगाना है। शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं, जहाँ बड़े आकार के चुम्बक नहीं लग सकते, कुछ अंगों पर छोटे चुम्बक ठीक से काम नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए अगर आँख पर चुम्बक लगाना हो तो छोटे आकार का गोल चुम्बक होना चाहिए, जो बंद आँख के ऊपर आ जाए। दूसरी ओर अगर शरीर के अधिकतर भागों में पीड़ा या सूजन है तो बड़े आकार का चुम्बक लगेगा। इसलिए एक ही आकार-प्रकार के चुम्बक का प्रयोग शरीर के विभिन्न भागों पर नहीं हो सकता। चुम्बकों की शक्ति पर भी यही बात लागू होती है।

शरीर के कुछ कोमल अंग जैसे मस्तिष्क, आँख और हृदय जहाँ अधिक शक्ति वाले चुम्बक नहीं लगाने चाहिए और न मध्यम शक्ति के चुम्बक अधिक देर तक लगाने चाहिए। इसके विपरीत कम शक्ति वाले चुम्बक कड़ी और बड़े आकार की मांसपेशियों या हड्डियों के रोगों के लिए काफी नहीं होंगे, जैसे कि कूल्हों, जँघाओं, घुटनों या एड़ियों की होती हैं। न केवल स्थानीय रोगों, बल्कि सारे शरीर के लिए चुम्बकों के चुनाव में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

रोगी के बैठने की स्थिति

उपचार लेते समय जमीन अथवा किसी लोहे की वस्तु (फेरामेग्नेटिक पदार्थ) से रोगी का संपर्क न हो, यह आवश्यक है। अतः लोहे की कुर्सी या पलंग वर्जित है, जबकि लकड़ी की कुर्सी या पलंग आदर्श है। चुम्बकों की स्थिति इस प्रकार रहनी चाहिए कि उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा की ओर तथा दक्षिणी ध्रुव दक्षिण दिशा की ओर रहे। इससे चुम्बक का क्षेत्र पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के समानांतर रहेगा और चुम्बक अधिक प्रभावशाली बनेंगे। यदि दो चुम्बकों के दो अलग-अलग ध्रुवों का प्रयोग एक ही समय किया जा रहा हो तो रोगी का मुँह पश्चिम की ओर होना चाहिए, जिससे कि उसके शरीर का दाहिना भाग उत्तर की ओर तथा बायां भाग दक्षिण की ओर रहे।

चुम्बक प्रयोग की अवधि

ऐसा उपयुक्त माना गया है कि चुम्बकों का स्थानिक अथवा सार्वदैहिक प्रयोग 10 मिनट से 30 मिनट तक समीचीन रहता है। वयस्कों के जीर्ण आमवाती सन्धिशोथ में पहले एक सप्ताह तक चुम्बकों का प्रयोग केवल 10 मिनट तक करना चाहिए और इस अवधि को धीरे-धीरे 30 मिनट तक बढ़ा देना चाहिए। अन्य कई रोगावस्थाओं में भी तदनुसार समय बढ़ाया जाना चाहिए। अधिक शक्तिशाली (जैसे 3000 गौस या उससे अधिक शक्ति वाले) चुम्बकों पर तद्नुसार घटा देनी चाहिए।

जब मस्तिष्क जैसे कोमलांगों पर चुम्बक का प्रयोग करना हो, तो यह अच्छी तरह समझ लें कि इसमें शक्तिशाली चुम्बक नहीं लगाए जाते। चुम्बक का प्रयोग 10 मिनट से अधिक कभी न किया जाए। वैसे अवधि के संबंध में अपना विवेक ही अधिक उत्तम माना जाता है। चुम्बक चिकित्सा का कोई प्रतिप्रभाव नहीं होता। फिर भी सिर का भारीपन, चक्कर, उलटी, लार टपकना आदि लक्षण मालूम हों तो चिंता न करें।


ऐसे किसी लक्षण को त्वरित दूर करना जरूरी हो तो जस्ते या तांबे की एक पट्टी पर दोनों हाथ 20-25 मिनट तक रखें। घुटनों के तथा गर्दन की कशेरुका सन्धि के प्रदाह की अवस्था में सुबह के समय 10 मिनट तक चुम्बकों का प्रयोग घुटनों पर तथा शाम को 10 मिनट तक गर्दन तथा दर्द के अंतिम भागों पर करना चाहिए, लेकिन इन अवस्थाओं में चुम्बकों की प्रयोग अवधि 10 मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।


कोशिकाओं पर चुम्बकों के प्रभाव का ज्ञान तथा अनुभव बताता है कि सावधानीपूर्वक किए गए उपयोग से शरीर पर इसका बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। फिर भी किसी अनपेक्षित प्रभाव से मुक्त रहने के लिए इन निम्नलिखित सावधानियों का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना चाहिए।

Chumbak chikitsa


चुम्बकों का चयन

चुम्बक का आकार और डिजाइन इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे शरीर के किस भाग पर लगाना है। शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं, जहाँ बड़े आकार के चुम्बक नहीं लग सकते, कुछ अंगों पर छोटे चुम्बक ठीक से काम नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए अगर आँख पर चुम्बक लगाना हो तो छोटे आकार का गोल चुम्बक होना चाहिए, जो बंद आँख के ऊपर आ जाए। दूसरी ओर अगर शरीर के अधिकतर भागों में पीड़ा या सूजन है तो बड़े आकार का चुम्बक लगेगा। इसलिए एक ही आकार-प्रकार के चुम्बक का प्रयोग शरीर के विभिन्न भागों पर नहीं हो सकता। चुम्बकों की शक्ति पर भी यही बात लागू होती है।

शरीर के कुछ कोमल अंग जैसे मस्तिष्क, आँख और हृदय जहाँ अधिक शक्ति वाले चुम्बक नहीं लगाने चाहिए और न मध्यम शक्ति के चुम्बक अधिक देर तक लगाने चाहिए। इसके विपरीत कम शक्ति वाले चुम्बक कड़ी और बड़े आकार की मांसपेशियों या हड्डियों के रोगों के लिए काफी नहीं होंगे, जैसे कि कूल्हों, जँघाओं, घुटनों या एड़ियों की होती हैं। न केवल स्थानीय रोगों, बल्कि सारे शरीर के लिए चुम्बकों के चुनाव में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

रोगी के बैठने की स्थिति

उपचार लेते समय जमीन अथवा किसी लोहे की वस्तु (फेरामेग्नेटिक पदार्थ) से रोगी का संपर्क न हो, यह आवश्यक है। अतः लोहे की कुर्सी या पलंग वर्जित है, जबकि लकड़ी की कुर्सी या पलंग आदर्श है। चुम्बकों की स्थिति इस प्रकार रहनी चाहिए कि उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा की ओर तथा दक्षिणी ध्रुव दक्षिण दिशा की ओर रहे। इससे चुम्बक का क्षेत्र पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के समानांतर रहेगा और चुम्बक अधिक प्रभावशाली बनेंगे। यदि दो चुम्बकों के दो अलग-अलग ध्रुवों का प्रयोग एक ही समय किया जा रहा हो तो रोगी का मुँह पश्चिम की ओर होना चाहिए, जिससे कि उसके शरीर का दाहिना भाग उत्तर की ओर तथा बायां भाग दक्षिण की ओर रहे।

चुम्बक प्रयोग की अवधि

ऐसा उपयुक्त माना गया है कि चुम्बकों का स्थानिक अथवा सार्वदैहिक प्रयोग 10 मिनट से 30 मिनट तक समीचीन रहता है। वयस्कों के जीर्ण आमवाती सन्धिशोथ में पहले एक सप्ताह तक चुम्बकों का प्रयोग केवल 10 मिनट तक करना चाहिए और इस अवधि को धीरे-धीरे 30 मिनट तक बढ़ा देना चाहिए। अन्य कई रोगावस्थाओं में भी तदनुसार समय बढ़ाया जाना चाहिए। अधिक शक्तिशाली (जैसे 3000 गौस या उससे अधिक शक्ति वाले) चुम्बकों पर तद्नुसार घटा देनी चाहिए।

जब मस्तिष्क जैसे कोमलांगों पर चुम्बक का प्रयोग करना हो, तो यह अच्छी तरह समझ लें कि इसमें शक्तिशाली चुम्बक नहीं लगाए जाते। चुम्बक का प्रयोग 10 मिनट से अधिक कभी न किया जाए। वैसे अवधि के संबंध में अपना विवेक ही अधिक उत्तम माना जाता है। चुम्बक चिकित्सा का कोई प्रतिप्रभाव नहीं होता। फिर भी सिर का भारीपन, चक्कर, उलटी, लार टपकना आदि लक्षण मालूम हों तो चिंता न करें।


ऐसे किसी लक्षण को त्वरित दूर करना जरूरी हो तो जस्ते या तांबे की एक पट्टी पर दोनों हाथ 20-25 मिनट तक रखें। घुटनों के तथा गर्दन की कशेरुका सन्धि के प्रदाह की अवस्था में सुबह के समय 10 मिनट तक चुम्बकों का प्रयोग घुटनों पर तथा शाम को 10 मिनट तक गर्दन तथा दर्द के अंतिम भागों पर करना चाहिए, लेकिन इन अवस्थाओं में चुम्बकों की प्रयोग अवधि 10 मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।