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Thursday, 6 September 2012
अनावश्यक मानसिक तनाव एक रोग
शब्दों की शक्ति से सेहत
लोगों का रूझान अब दवाइयाँ गटकने की बजाय शब्दों से हिलिंग करने की ओर जा रहा है। वैसे तो शब्दों की शक्ति से किसी बीमारी को जड़ से मिटा देने की यह थैरेपी नई नहीं है। इसे हम हिप्नोटिज्म या हिप्नोथैरेपी के रूप में जानते हैं।
यह वह कला है जो दवाई की तुलना में ज्यादा असरदार होती है। वैचारिक असंतुलन या मानसिक रोग में ९० प्रतिशत केसेस ऐसे हैं जिन्हें हिप्नोथैरेपी से ठीक किया जा सकता है। लोगों में असामान्य व्यवहार की वजहें फोबिया, सोशो इकानामिकल फैक्टर, बायोलाजीकल फैक्टर, केमिकल रिजन, मेल नरिशमेंट और जेनेटिक फैक्टर हो सकते हैं।
वैकल्पिक इलाज के रूप में सम्मोहन
केस हिस्ट्री
27 वर्षीय इंजीनियर राकेश शर्मा (नाम परिवर्तित) अज्ञात भय का शिकार। काफी इलाज करवाया किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में दोस्त के कहने पर हिप्नोथैरेपिस्ट की शरण ली। टाइम रीग्रेशन थैरेपी से पता चला कि वह पिछले जन्म में किसान था। उसकी पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद उसे उसकी बहू बहुत परेशान करती थी। परेशानी से निजात पाने के लिए अपने ही खेत में फाँसी को गले लगा लिया। अब कोई भय नहीं लगता है। निडरतापूर्वक रहते हैं।
केस हिस्ट्री
सुनिल मंडलोई (परिवर्तित नाम) बचपन से ही एक सपना दिखाई देता था। चारों तरफ रेत ही रेत है, ऊँट पर कुछ लोग बैठे हैं। कोई मुझे आवाज दे रहा है। मैं चिल्लाता हूँ कि मैं आ रहा हूँ और नींद खुल जाती है। आखिर यह सपना मुझे बार-बार क्यों आता है।
टाइम रीग्रेशन थैरेपी से ज्ञात हुआ कि पिछले जन्म में बीकानेर के पास एक गाँव गरीबी में दिन गुजार रहे थे। पाकिस्तान से कुछ लोग आते थे और स्मगलिंग के लिए प्रेरित करते थे। लेकिन पत्नी की इच्छा नहीं थी कि वे गलत रास्ते पर जाए। वो नहीं माना और उन लोगों के साथ चल दिया लेकिन रास्ते में साँप के काटने से मृत्यु हो गई। अब सपना आना बंद हो गया है और चैन की नींद सोते हैं।
सिर्फ दो ही केस नहीं रोजाना ऐसे कई केसेस आते हैं जो व्यक्ति विशेष के भूत या भविष्य से जुड़े होते हैं। हिप्नोथैरेपिस्ट डॉ. सिंघ कहते हैं विचार वायरस का काम करते हैं। लोगों में भय समाया हुआ है।
किसी को नौकरी छूट जाने का भय है तो कोई एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर से परेशान है तो कोई डिप्रेशन का शिकार है तो किसी में लेक ऑफ कॉन्फिडेंस है। ऐसे कई कारण हैं जो मानसिक तनाव को जन्म देते हैं जो कभी-कभी दौरों में बदल जाते हैं और मानसिक रोगों का कारण बनते हैं।
कैसे बनाएँ दूरी इनसे
" मेडिटेशन करें
" बायोक्लॉक सेट होना चाहिए यानी निश्चित समय पर सोए
" चरित्र ठीक रखें
" झूठ न बोलें
" संबंधों के प्रति गंभीर रहें
" आहार व विहार सही रखें
" आवेग, आक्रोश को हावी न होने दें।
यह वह कला है जो दवाई की तुलना में ज्यादा असरदार होती है। वैचारिक असंतुलन या मानसिक रोग में ९० प्रतिशत केसेस ऐसे हैं जिन्हें हिप्नोथैरेपी से ठीक किया जा सकता है। लोगों में असामान्य व्यवहार की वजहें फोबिया, सोशो इकानामिकल फैक्टर, बायोलाजीकल फैक्टर, केमिकल रिजन, मेल नरिशमेंट और जेनेटिक फैक्टर हो सकते हैं।
वैकल्पिक इलाज के रूप में सम्मोहन
केस हिस्ट्री
27 वर्षीय इंजीनियर राकेश शर्मा (नाम परिवर्तित) अज्ञात भय का शिकार। काफी इलाज करवाया किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। अंत में दोस्त के कहने पर हिप्नोथैरेपिस्ट की शरण ली। टाइम रीग्रेशन थैरेपी से पता चला कि वह पिछले जन्म में किसान था। उसकी पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद उसे उसकी बहू बहुत परेशान करती थी। परेशानी से निजात पाने के लिए अपने ही खेत में फाँसी को गले लगा लिया। अब कोई भय नहीं लगता है। निडरतापूर्वक रहते हैं।
केस हिस्ट्री
सुनिल मंडलोई (परिवर्तित नाम) बचपन से ही एक सपना दिखाई देता था। चारों तरफ रेत ही रेत है, ऊँट पर कुछ लोग बैठे हैं। कोई मुझे आवाज दे रहा है। मैं चिल्लाता हूँ कि मैं आ रहा हूँ और नींद खुल जाती है। आखिर यह सपना मुझे बार-बार क्यों आता है।
टाइम रीग्रेशन थैरेपी से ज्ञात हुआ कि पिछले जन्म में बीकानेर के पास एक गाँव गरीबी में दिन गुजार रहे थे। पाकिस्तान से कुछ लोग आते थे और स्मगलिंग के लिए प्रेरित करते थे। लेकिन पत्नी की इच्छा नहीं थी कि वे गलत रास्ते पर जाए। वो नहीं माना और उन लोगों के साथ चल दिया लेकिन रास्ते में साँप के काटने से मृत्यु हो गई। अब सपना आना बंद हो गया है और चैन की नींद सोते हैं।
सिर्फ दो ही केस नहीं रोजाना ऐसे कई केसेस आते हैं जो व्यक्ति विशेष के भूत या भविष्य से जुड़े होते हैं। हिप्नोथैरेपिस्ट डॉ. सिंघ कहते हैं विचार वायरस का काम करते हैं। लोगों में भय समाया हुआ है।
किसी को नौकरी छूट जाने का भय है तो कोई एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर से परेशान है तो कोई डिप्रेशन का शिकार है तो किसी में लेक ऑफ कॉन्फिडेंस है। ऐसे कई कारण हैं जो मानसिक तनाव को जन्म देते हैं जो कभी-कभी दौरों में बदल जाते हैं और मानसिक रोगों का कारण बनते हैं।
कैसे बनाएँ दूरी इनसे
" मेडिटेशन करें
" बायोक्लॉक सेट होना चाहिए यानी निश्चित समय पर सोए
" चरित्र ठीक रखें
" झूठ न बोलें
" संबंधों के प्रति गंभीर रहें
" आहार व विहार सही रखें
" आवेग, आक्रोश को हावी न होने दें।
लोगों का रूझान अब दवाइयाँ गटकने की बजाय शब्दों से हिलिंग करने की ओर जा रहा है। वैसे तो शब्दों की शक्ति से किसी बीमारी को जड़ से मिटा देने की यह थैरेपी नई नहीं है। इसे हम हिप्नोटिज्म या हिप्नोथैरेपी के रूप में जानते हैं।
यह वह कला है जो दवाई की तुलना में ज्यादा असरदार होती है। वैचारिक असंतुलन या मानसिक रोग में ९० प्रतिशत केसेस ऐसे हैं जिन्हें हिप्नोथैरेपी से ठीक किया जा सकता है। लोगों में असामान्य व्यवहार की वजहें फोबिया, सोशो इकानामिकल फैक्टर, बायोलाजीकल फैक्टर, केमिकल रिजन, मेल नरिशमेंट और जेनेटिक फैक्टर हो सकते हैं। |
डर को दूर भगाए सम्मोहन चिकित्सा
मानव प्रकृति है कि वह हर उस चीज से दूर भागना चाहता है, जिससे उसे डर लगता है, जो उसे नापसंद होती है या जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित होती है। अपने अस्तित्व को खतरे में कौन डालना चाहता है?
दुश्चिन्ता का ही एक रूप आतंक अथवा अयथार्थ भय है। भय स्वयंभी चिंता का कारण होता है। साधारण भय और भय रोग (फोबिया) में यह अंतर है। खतरे की स्थिति में जो शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया होती है वह तो सचमुच का भय है। जबकि भय की अनुभूति अथवा काल्पनिक कारणों से भयभीत होना भय रोग कहलाता है।
अनेक प्रकार के अयथार्थ भय पाए जाते हैं जैसे खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया), ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया), बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया), अँधेरे का भय (निक्टो फोबिया), गंदगी का भय (माइसो फोबिया)।
खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया) :
कभी-कभी कई बार हमें कुछ व्यक्ति यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें खुले स्थान में जाने से डर लगता है। वह व्यक्ति खुले स्थान में अकेले नहीं रह सकता। इस प्रकार का डर ही एगोरा फोबिया कहलाता है। इसमें व्यक्ति बाहर अकेले जाने से या खुले में जाने से डरता है।
ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया) :
इसके अंतर्गत व्यक्ति ऊँचाई पर जाने से डरता है। घबराहट होती है, चक्कर आते हैं, उसे ऐसा लगता है कि वह ऊँचाई पर पहुँचते ही गिर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। कई बार जब यह डर व्यक्ति के गहराई में पहुँच जाता है तो वह बेहोश भी हो जाता है।
बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया) :
कुछ लोगों को बंद स्थान का भय लगता है। बंद स्थान के भय से आशय है उसमें व्यक्ति को लगता है कि अगर वह बंद कमरे में रहता है या रहेगा तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी। वह चाहता है कि वह हर वक्त खुले स्थान में रहे। अगर वह कमरे में भी है तो वह चाहता है कि सारे दरवाजे, खिड़कियाँ खोल दे ताकि अंदर हवा आती रहे। अगर दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो जाएँगे तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी।
मानव प्रकृति है कि वह हर उस चीज से दूर भागना चाहता है, जिससे उसे डर लगता है, जो उसे नापसंद होती है या जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित होती है। अपने अस्तित्व को खतरे में कौन डालना चाहता है?
दुश्चिन्ता का ही एक रूप आतंक अथवा अयथार्थ भय है। भय स्वयंभी चिंता का कारण होता है। साधारण भय और भय रोग (फोबिया) में यह अंतर है। खतरे की स्थिति में जो शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया होती है वह तो सचमुच का भय है। जबकि भय की अनुभूति अथवा काल्पनिक कारणों से भयभीत होना भय रोग कहलाता है।
अनेक प्रकार के अयथार्थ भय पाए जाते हैं जैसे खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया), ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया), बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया), अँधेरे का भय (निक्टो फोबिया), गंदगी का भय (माइसो फोबिया)।
खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया) :
कभी-कभी कई बार हमें कुछ व्यक्ति यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें खुले स्थान में जाने से डर लगता है। वह व्यक्ति खुले स्थान में अकेले नहीं रह सकता। इस प्रकार का डर ही एगोरा फोबिया कहलाता है। इसमें व्यक्ति बाहर अकेले जाने से या खुले में जाने से डरता है।
ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया) :
इसके अंतर्गत व्यक्ति ऊँचाई पर जाने से डरता है। घबराहट होती है, चक्कर आते हैं, उसे ऐसा लगता है कि वह ऊँचाई पर पहुँचते ही गिर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। कई बार जब यह डर व्यक्ति के गहराई में पहुँच जाता है तो वह बेहोश भी हो जाता है।
बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया) :
कुछ लोगों को बंद स्थान का भय लगता है। बंद स्थान के भय से आशय है उसमें व्यक्ति को लगता है कि अगर वह बंद कमरे में रहता है या रहेगा तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी। वह चाहता है कि वह हर वक्त खुले स्थान में रहे। अगर वह कमरे में भी है तो वह चाहता है कि सारे दरवाजे, खिड़कियाँ खोल दे ताकि अंदर हवा आती रहे। अगर दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो जाएँगे तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी।
दुश्चिन्ता का ही एक रूप आतंक अथवा अयथार्थ भय है। भय स्वयंभी चिंता का कारण होता है। साधारण भय और भय रोग (फोबिया) में यह अंतर है। खतरे की स्थिति में जो शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया होती है वह तो सचमुच का भय है। जबकि भय की अनुभूति अथवा काल्पनिक कारणों से भयभीत होना भय रोग कहलाता है।
अनेक प्रकार के अयथार्थ भय पाए जाते हैं जैसे खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया), ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया), बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया), अँधेरे का भय (निक्टो फोबिया), गंदगी का भय (माइसो फोबिया)।
खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया) :
कभी-कभी कई बार हमें कुछ व्यक्ति यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें खुले स्थान में जाने से डर लगता है। वह व्यक्ति खुले स्थान में अकेले नहीं रह सकता। इस प्रकार का डर ही एगोरा फोबिया कहलाता है। इसमें व्यक्ति बाहर अकेले जाने से या खुले में जाने से डरता है।
ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया) :
इसके अंतर्गत व्यक्ति ऊँचाई पर जाने से डरता है। घबराहट होती है, चक्कर आते हैं, उसे ऐसा लगता है कि वह ऊँचाई पर पहुँचते ही गिर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। कई बार जब यह डर व्यक्ति के गहराई में पहुँच जाता है तो वह बेहोश भी हो जाता है।
बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया) :
कुछ लोगों को बंद स्थान का भय लगता है। बंद स्थान के भय से आशय है उसमें व्यक्ति को लगता है कि अगर वह बंद कमरे में रहता है या रहेगा तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी। वह चाहता है कि वह हर वक्त खुले स्थान में रहे। अगर वह कमरे में भी है तो वह चाहता है कि सारे दरवाजे, खिड़कियाँ खोल दे ताकि अंदर हवा आती रहे। अगर दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो जाएँगे तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी।
मानव प्रकृति है कि वह हर उस चीज से दूर भागना चाहता है, जिससे उसे डर लगता है, जो उसे नापसंद होती है या जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित होती है। अपने अस्तित्व को खतरे में कौन डालना चाहता है?
दुश्चिन्ता का ही एक रूप आतंक अथवा अयथार्थ भय है। भय स्वयंभी चिंता का कारण होता है। साधारण भय और भय रोग (फोबिया) में यह अंतर है। खतरे की स्थिति में जो शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया होती है वह तो सचमुच का भय है। जबकि भय की अनुभूति अथवा काल्पनिक कारणों से भयभीत होना भय रोग कहलाता है।
अनेक प्रकार के अयथार्थ भय पाए जाते हैं जैसे खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया), ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया), बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया), अँधेरे का भय (निक्टो फोबिया), गंदगी का भय (माइसो फोबिया)।
खुले स्थान का भय (एगोरा फोबिया) :
कभी-कभी कई बार हमें कुछ व्यक्ति यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें खुले स्थान में जाने से डर लगता है। वह व्यक्ति खुले स्थान में अकेले नहीं रह सकता। इस प्रकार का डर ही एगोरा फोबिया कहलाता है। इसमें व्यक्ति बाहर अकेले जाने से या खुले में जाने से डरता है।
ऊँचाई का भय (एक्रो फोबिया) :
इसके अंतर्गत व्यक्ति ऊँचाई पर जाने से डरता है। घबराहट होती है, चक्कर आते हैं, उसे ऐसा लगता है कि वह ऊँचाई पर पहुँचते ही गिर जाएगा या उसे कुछ हो जाएगा। कई बार जब यह डर व्यक्ति के गहराई में पहुँच जाता है तो वह बेहोश भी हो जाता है।
बंद स्थान का भय (क्लास्ट्रो फोबिया) :
कुछ लोगों को बंद स्थान का भय लगता है। बंद स्थान के भय से आशय है उसमें व्यक्ति को लगता है कि अगर वह बंद कमरे में रहता है या रहेगा तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी। वह चाहता है कि वह हर वक्त खुले स्थान में रहे। अगर वह कमरे में भी है तो वह चाहता है कि सारे दरवाजे, खिड़कियाँ खोल दे ताकि अंदर हवा आती रहे। अगर दरवाजे-खिड़कियाँ बंद हो जाएँगे तो उसे घुटन होगी, घबराहट होगी।
सु-जोक चिकित्सा
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सु-जोक चिकित्सा : उपचार पद्धति
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शरीर में मनोभावों का संग्रह
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रोग का समूल उपचार रेकी से
रेकी का इतिहास
हमारा देश आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न देश है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके प्रमाण पाए गए हैं, किंतु गुरु-शिष्य परंपरा के कारण यह विद्या मौखिक रूप से ही रही। लिखित में यह विद्या न होने से धीरे-धीरे इस विद्या का लोप होता चला गया।
2500 वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।
19वीं शताब्दी में जापान के डॉ. मिकाओ उसुई ने इस विद्या की पुनः खोज की और आज यह विद्या रेकी के रूप में पूरे विश्र्व में फैल गई है। डॉ. मिकाओ उसुई की इस चमत्कारिक खोज ने 'स्पर्श चिकित्सा' के रूप में संपूर्ण विश्व को चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान की है।
रेकी सीखने के लाभ
1. यह शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक स्तरों को प्रभावित करती है।
2. शरीर की अवरुद्ध ऊर्जा को सुचारुता प्रदान करती है।
3. शरीर में व्याप्त नकारात्मक प्रवाह को दूर करती है।
4. अतीद्रिंय मानसिक शक्तियों को बढ़ाती है।
5. शरीर की रोगों से लड़ने वाली शक्ति को प्रभावी बनाती है।
6. ध्यान लगाने के लिए सहायक होती है।
7. समक्ष एवं परोक्ष उपचार करती है।
8. सजीव एवं निर्जीव सभी का उपचार करती है।
9. रोग का समूल उपचार करती है।
10. पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती है।
हमारा देश आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न देश है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके प्रमाण पाए गए हैं, किंतु गुरु-शिष्य परंपरा के कारण यह विद्या मौखिक रूप से ही रही। लिखित में यह विद्या न होने से धीरे-धीरे इस विद्या का लोप होता चला गया।
2500 वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।
19वीं शताब्दी में जापान के डॉ. मिकाओ उसुई ने इस विद्या की पुनः खोज की और आज यह विद्या रेकी के रूप में पूरे विश्र्व में फैल गई है। डॉ. मिकाओ उसुई की इस चमत्कारिक खोज ने 'स्पर्श चिकित्सा' के रूप में संपूर्ण विश्व को चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान की है।
रेकी सीखने के लाभ
1. यह शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक स्तरों को प्रभावित करती है।
2. शरीर की अवरुद्ध ऊर्जा को सुचारुता प्रदान करती है।
3. शरीर में व्याप्त नकारात्मक प्रवाह को दूर करती है।
4. अतीद्रिंय मानसिक शक्तियों को बढ़ाती है।
5. शरीर की रोगों से लड़ने वाली शक्ति को प्रभावी बनाती है।
6. ध्यान लगाने के लिए सहायक होती है।
7. समक्ष एवं परोक्ष उपचार करती है।
8. सजीव एवं निर्जीव सभी का उपचार करती है।
9. रोग का समूल उपचार करती है।
10. पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती है।
रेकी की आभार विधि
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रेकी का महत्त्व एवं उपयोग
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स्मरण शक्ति हेतु पिरामिड कैप
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पिरामिड चिकित्सा : एक परिचय
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चुम्बक चिकित्सा की पद्धति
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चुम्बक प्रयोग में सावधानियाँ
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