कोशिकाओं पर चुम्बकों के प्रभाव का ज्ञान तथा अनुभव बताता है कि सावधानीपूर्वक किए गए उपयोग से शरीर पर इसका बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। फिर भी किसी अनपेक्षित प्रभाव से मुक्त रहने के लिए इन निम्नलिखित सावधानियों का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना चाहिए।
चुम्बकों का चयनचुम्बक का आकार और डिजाइन इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे शरीर के किस भाग पर लगाना है। शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं, जहाँ बड़े आकार के चुम्बक नहीं लग सकते, कुछ अंगों पर छोटे चुम्बक ठीक से काम नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए अगर आँख पर चुम्बक लगाना हो तो छोटे आकार का गोल चुम्बक होना चाहिए, जो बंद आँख के ऊपर आ जाए। दूसरी ओर अगर शरीर के अधिकतर भागों में पीड़ा या सूजन है तो बड़े आकार का चुम्बक लगेगा। इसलिए एक ही आकार-प्रकार के चुम्बक का प्रयोग शरीर के विभिन्न भागों पर नहीं हो सकता। चुम्बकों की शक्ति पर भी यही बात लागू होती है।शरीर के कुछ कोमल अंग जैसे मस्तिष्क, आँख और हृदय जहाँ अधिक शक्ति वाले चुम्बक नहीं लगाने चाहिए और न मध्यम शक्ति के चुम्बक अधिक देर तक लगाने चाहिए। इसके विपरीत कम शक्ति वाले चुम्बक कड़ी और बड़े आकार की मांसपेशियों या हड्डियों के रोगों के लिए काफी नहीं होंगे, जैसे कि कूल्हों, जँघाओं, घुटनों या एड़ियों की होती हैं। न केवल स्थानीय रोगों, बल्कि सारे शरीर के लिए चुम्बकों के चुनाव में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।रोगी के बैठने की स्थितिउपचार लेते समय जमीन अथवा किसी लोहे की वस्तु (फेरामेग्नेटिक पदार्थ) से रोगी का संपर्क न हो, यह आवश्यक है। अतः लोहे की कुर्सी या पलंग वर्जित है, जबकि लकड़ी की कुर्सी या पलंग आदर्श है। चुम्बकों की स्थिति इस प्रकार रहनी चाहिए कि उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा की ओर तथा दक्षिणी ध्रुव दक्षिण दिशा की ओर रहे। इससे चुम्बक का क्षेत्र पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के समानांतर रहेगा और चुम्बक अधिक प्रभावशाली बनेंगे। यदि दो चुम्बकों के दो अलग-अलग ध्रुवों का प्रयोग एक ही समय किया जा रहा हो तो रोगी का मुँह पश्चिम की ओर होना चाहिए, जिससे कि उसके शरीर का दाहिना भाग उत्तर की ओर तथा बायां भाग दक्षिण की ओर रहे।चुम्बक प्रयोग की अवधिऐसा उपयुक्त माना गया है कि चुम्बकों का स्थानिक अथवा सार्वदैहिक प्रयोग 10 मिनट से 30 मिनट तक समीचीन रहता है। वयस्कों के जीर्ण आमवाती सन्धिशोथ में पहले एक सप्ताह तक चुम्बकों का प्रयोग केवल 10 मिनट तक करना चाहिए और इस अवधि को धीरे-धीरे 30 मिनट तक बढ़ा देना चाहिए। अन्य कई रोगावस्थाओं में भी तदनुसार समय बढ़ाया जाना चाहिए। अधिक शक्तिशाली (जैसे 3000 गौस या उससे अधिक शक्ति वाले) चुम्बकों पर तद्नुसार घटा देनी चाहिए।जब मस्तिष्क जैसे कोमलांगों पर चुम्बक का प्रयोग करना हो, तो यह अच्छी तरह समझ लें कि इसमें शक्तिशाली चुम्बक नहीं लगाए जाते। चुम्बक का प्रयोग 10 मिनट से अधिक कभी न किया जाए। वैसे अवधि के संबंध में अपना विवेक ही अधिक उत्तम माना जाता है। चुम्बक चिकित्सा का कोई प्रतिप्रभाव नहीं होता। फिर भी सिर का भारीपन, चक्कर, उलटी, लार टपकना आदि लक्षण मालूम हों तो चिंता न करें।ऐसे किसी लक्षण को त्वरित दूर करना जरूरी हो तो जस्ते या तांबे की एक पट्टी पर दोनों हाथ 20-25 मिनट तक रखें। घुटनों के तथा गर्दन की कशेरुका सन्धि के प्रदाह की अवस्था में सुबह के समय 10 मिनट तक चुम्बकों का प्रयोग घुटनों पर तथा शाम को 10 मिनट तक गर्दन तथा दर्द के अंतिम भागों पर करना चाहिए, लेकिन इन अवस्थाओं में चुम्बकों की प्रयोग अवधि 10 मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।
कोशिकाओं पर चुम्बकों के प्रभाव का ज्ञान तथा अनुभव बताता है कि सावधानीपूर्वक किए गए उपयोग से शरीर पर इसका बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। फिर भी किसी अनपेक्षित प्रभाव से मुक्त रहने के लिए इन निम्नलिखित सावधानियों का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाना चाहिए।
चुम्बकों का चयन
चुम्बक का आकार और डिजाइन इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे शरीर के किस भाग पर लगाना है। शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं, जहाँ बड़े आकार के चुम्बक नहीं लग सकते, कुछ अंगों पर छोटे चुम्बक ठीक से काम नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए अगर आँख पर चुम्बक लगाना हो तो छोटे आकार का गोल चुम्बक होना चाहिए, जो बंद आँख के ऊपर आ जाए। दूसरी ओर अगर शरीर के अधिकतर भागों में पीड़ा या सूजन है तो बड़े आकार का चुम्बक लगेगा। इसलिए एक ही आकार-प्रकार के चुम्बक का प्रयोग शरीर के विभिन्न भागों पर नहीं हो सकता। चुम्बकों की शक्ति पर भी यही बात लागू होती है।
शरीर के कुछ कोमल अंग जैसे मस्तिष्क, आँख और हृदय जहाँ अधिक शक्ति वाले चुम्बक नहीं लगाने चाहिए और न मध्यम शक्ति के चुम्बक अधिक देर तक लगाने चाहिए। इसके विपरीत कम शक्ति वाले चुम्बक कड़ी और बड़े आकार की मांसपेशियों या हड्डियों के रोगों के लिए काफी नहीं होंगे, जैसे कि कूल्हों, जँघाओं, घुटनों या एड़ियों की होती हैं। न केवल स्थानीय रोगों, बल्कि सारे शरीर के लिए चुम्बकों के चुनाव में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
रोगी के बैठने की स्थिति
उपचार लेते समय जमीन अथवा किसी लोहे की वस्तु (फेरामेग्नेटिक पदार्थ) से रोगी का संपर्क न हो, यह आवश्यक है। अतः लोहे की कुर्सी या पलंग वर्जित है, जबकि लकड़ी की कुर्सी या पलंग आदर्श है। चुम्बकों की स्थिति इस प्रकार रहनी चाहिए कि उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा की ओर तथा दक्षिणी ध्रुव दक्षिण दिशा की ओर रहे। इससे चुम्बक का क्षेत्र पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के समानांतर रहेगा और चुम्बक अधिक प्रभावशाली बनेंगे। यदि दो चुम्बकों के दो अलग-अलग ध्रुवों का प्रयोग एक ही समय किया जा रहा हो तो रोगी का मुँह पश्चिम की ओर होना चाहिए, जिससे कि उसके शरीर का दाहिना भाग उत्तर की ओर तथा बायां भाग दक्षिण की ओर रहे।
चुम्बक प्रयोग की अवधि
ऐसा उपयुक्त माना गया है कि चुम्बकों का स्थानिक अथवा सार्वदैहिक प्रयोग 10 मिनट से 30 मिनट तक समीचीन रहता है। वयस्कों के जीर्ण आमवाती सन्धिशोथ में पहले एक सप्ताह तक चुम्बकों का प्रयोग केवल 10 मिनट तक करना चाहिए और इस अवधि को धीरे-धीरे 30 मिनट तक बढ़ा देना चाहिए। अन्य कई रोगावस्थाओं में भी तदनुसार समय बढ़ाया जाना चाहिए। अधिक शक्तिशाली (जैसे 3000 गौस या उससे अधिक शक्ति वाले) चुम्बकों पर तद्नुसार घटा देनी चाहिए।
जब मस्तिष्क जैसे कोमलांगों पर चुम्बक का प्रयोग करना हो, तो यह अच्छी तरह समझ लें कि इसमें शक्तिशाली चुम्बक नहीं लगाए जाते। चुम्बक का प्रयोग 10 मिनट से अधिक कभी न किया जाए। वैसे अवधि के संबंध में अपना विवेक ही अधिक उत्तम माना जाता है। चुम्बक चिकित्सा का कोई प्रतिप्रभाव नहीं होता। फिर भी सिर का भारीपन, चक्कर, उलटी, लार टपकना आदि लक्षण मालूम हों तो चिंता न करें।
ऐसे किसी लक्षण को त्वरित दूर करना जरूरी हो तो जस्ते या तांबे की एक पट्टी पर दोनों हाथ 20-25 मिनट तक रखें। घुटनों के तथा गर्दन की कशेरुका सन्धि के प्रदाह की अवस्था में सुबह के समय 10 मिनट तक चुम्बकों का प्रयोग घुटनों पर तथा शाम को 10 मिनट तक गर्दन तथा दर्द के अंतिम भागों पर करना चाहिए, लेकिन इन अवस्थाओं में चुम्बकों की प्रयोग अवधि 10 मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।
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